श्री गधे जी का महत्व – वैशाखी अमावस्या पर
May 3rd
इतिहास गवाह है कि गधे पूज्य रहे हैं, यहाँ तक कि अधिकाँशतः प्राचीन ग्रँथों में इन्हें गर्दभराज कह कर आगे >
बचना ओ खबीसों…. मैं बच कर आ गया
Apr 24th
हाँ जी सच है, बड़े बेहूदे ढँग से मेरी एँट्री हो रही है…. सोचा था ब्लॉग हम ना लिखेंगे, कीबोर्डवा पर ऊँगरिया हम ना तोड़ेंगे.. टिप्पणी से गुज़र-बसर हम भी करेंगे.. पण ? पण.. निट्ठल्ले ने दम कर दिया, मारे डाह के जरा जा रहा था कि इस महीने उनको दो पोस्ट दे डाली.. मेरे को ? दिल ने कहा कि, देखो बेशर्मों की तरह इसी कूचे के चक्कर लगाते रहने से अच्छा कुछ कचड़ा ठेल डालो, दिमाग का पर्यावरण स्वच्छ रहेगा । भाई लोगों ने सोचा होगा कि डॉक्टर आयेगा, कैंसर-गाथा पर कोई बिसूरती हुई पोस्ट लिख-लिखा कर सहानुभूति टिप्पणी बटोरने की चाल चलेगा । सच है, मैं आधे ज़बड़े का आदमी बिसूर तो रहा हूँ, पर किसी और कारण से ? बूझो तो जानें, तब तक मैं उन सभी भाईवृँदों का धन्यवाद ज्ञापन करता हूँ जिन्होंनें ऎसी ताबड़तोड़ शुभकामनायें दी, कि चित्रगुप्त महाराज ने दबाव में आकर मेरा टेंडर ही पास न किया, सोचा होगा यह बँदा 2जी का बाप कोई 4जी ( फोर्जरी नहीं यार, 4जी ) वाला है ! आज होली है तो मेरा बहकना लाज़िमी है, बात शुभकामनाओं पर चल रही थी.. यदि नाम ले लेकर एक एक को धन्यवाद दूँ तो पब्लिक को मेरे गुट आगे >
बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. ..
Jun 7th
बेशक पोस्ट टिप्पणी ठेलोऽऽऽऽ.. निट्ठल्ला ये कैताऽ
पर ऎसी टुँगी कभी न छोड़ो, जिससे दिल दुखे व भगदड़ मचता
हालिया घटनाक्रम से तो यही लग रहा है कि “चलो रसातल ओर हो ब्लॉगर .. चलो रसातल ओर“ भविष्य का हमारा ब्लॉगगीत बन जायेगा ! फोटो ऎडिटिंग टूल्स के साथ यह निट्ठल्लाकारी खींच-तान उन्हीं अनमने क्षणों की देन है । कभी “एकला चोलो रे“ से ब्लॉगिंग आरँभ किया था लोग जुड़ते गये, हौसला बढ़ता गया । लगता है कि मैं खुद बखुद अपने कारवाँ से बिछड़ता जा रहा हूँ । स्वयँ से प्रश्न करें, आप यहाँ क्यों मौज़ूद हैं ? इति शुभम
मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ…
Mar 7th
इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य से भी अधिक हिट होने की सँभावना रखता है ( चाहें तो आप अपनी प्रति सुरक्षित करवा लें )
साथ ही मैं मैं रवि छत्तीसगढ़ी रवि रतलामी भाई से अनुरोध करूँगा कि यदि वह मेरी हरकतों को अनदेखा न कर सकें, तो उसका समर्थन अवश्य करें । मेरे 19 वर्ष के लेखन अनुभव में इस प्रकार का लड़कपन ज़ायज़ है !
मैं आज की चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ .. कारण निताँत व्यक्तिगत है, पर सार्वज़निक मँच का दुरुपयोग मेरा अधिकार है क्योंकि हम लोकतँत्र के चौथे खँभे हैं, और लोकमत की स्वतँत्र आवाज़ भी ! आदरणीय चर्चाकार स्पष्ट करें कि 1. उन्हें शीर्ष ब्लॉग्स को यहाँ लाने का अधिकार किसने दिया ? 2. आज की चर्चा में विवाद का एक्को बिन्दु न होना, कहाँ तक ज़ायज़ है ? प्रकाराँतर में आप हिन्दी ब्लॉगिंग को टाइमखोटी करने के अवसर से वँचित कर रहे हैं । 3. जब कि हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है, सभी सँदर्भित ब्लॉग विदेशी भाषा के ही आगे >
ग़र होश जरा सा अब तक है फ़ाग़ी.. होश तू अपना तौल !
Mar 2nd
लगा कि ये साल वी सुक्खा-सुखियाँ ही निकल जाने को है, पर वह न हुआ । अपना आज कुछ ऎसा डौल लग गया कि, लगदा है आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा ।
ऒऎ कोई नहीं, वो तो जैसे ही सन्दीप ने एक ठोका, यो लाग्या कि अब आगया मौका. लेकिन जैसे ही भाई परभजोत ने तीसरा ठोका, दिल इस कदर बल्ले बल्ले होया, कि इक माहौल बन गया.. ना जी, ये तो सेलेब्रेट का मामला है, मौका और माहौल दोनों आन मिले उम्मीद थी कि गला-वला तर करने को आज गृह मँत्रालय से अँतरिम राहत मिल जायेगी । पर सनम जी ?
वह तो झू्ठियों की सरदार निकलीं । चहक कर उचकीं, ऒऎ क्या बात है, " चक दे इँडिया !" और पलट कर मेरी चहक को छील कर धर दिहिन, बड़ी चालाकी से चर्राती भयीं, ऒऎ ज़िन्दगी का मज़ा एक बार होश में लेकर भी देख.. ज़रूरी है कि खुशी के इज़हार में हमेशा बेहोश होकर ही लोटेगा ? अच्छा चलो परमिशन दिया.. लेकिन तुम्हारा मद्यप्राशन कौन करायेगा, जरा हम भी तो देखें ? ( इसके जिम्मेदार आप हो समीर भाई, विन्टेज़ की एक बोतलिया बेचारी तुमसे सीलभँग करवाने को अहिल्या बनी एक बरिस से तैयार बईठी है, अपने इंडिया आगे >
मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है
Jan 11th
एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो वहू ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़ लिहै से उनकी अकड़ की तो आप पूछौ मति ! एहर साहब को डीप-रेस्सन का शौक रहा, जब वह गोली खाय के मूड़ झुकाय के बईठें, तो यहि देख के, ई दुईनो तीनों जन उनके ठियाँ पर जाँय अउर टिपिया आवत रहें । गँज़ी चाँद पर टिपियावै में नौकरी जाय का खतरा, पर ईहाँ टिपियाये पर पगार बढ़वाय का जतरा । दफ़तर जाये से पहिले साहब जी नाश्ते में एक छोटा-कप बीति-ताहि बिलागरस ज़रूर लेत रहें । कुल मिला कर ज़ायज़ा यह कि उनकी एक सुसम्पन्न ब्लॉगर परिवार की छवि बनती रही..
अपने बड़का बिलागर वईसे तो शाकाहारी रहें लेकिन मीट के बड़े शौकीन रहें… जौन रस्ते निकर पड़ें ऊहैं लेयो धड़ाक एकु बिलागर मीट… एहिके सबूत का फोटू उनके मोबैईल में हर घड़ी मौज़ूद रहती आगे >





