मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है

एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़  लिहै  से  उनकी  अकड़  की  तो  आप  पूछौ मति ! एहर साहब को डीप-रेस्सन का शौक रहा, जब वह गोली खाय के मूड़ झुकाय के बईठें, तो यहि देख के, ई दुईनो तीनों जन उनके ठियाँ पर जाँय अउर टिपिया आवत रहें । गँज़ी चाँद पर टिपियावै में नौकरी जाय का खतरा, पर ईहाँ टिपियाये पर पगार बढ़वाय का जतरा । दफ़तर जाये से पहिले साहब जी नाश्ते में एक छोटा-कप बीति-ताहि बिलागरस ज़रूर लेत रहें । कुल मिला कर ज़ायज़ा यह कि उनकी एक सुसम्पन्न ब्लॉगर परिवार की  छवि  बनती  रही..

अपने  बड़का बिलागर वईसे तो शाकाहारी रहें लेकिन मीट के बड़े शौकीन रहें… जौन रस्ते निकर पड़ें ऊहैं लेयो धड़ाक  एकु  बिलागर मीट… एहिके  सबूत  का  फोटू  उनके  मोबैईल  में  हर  घड़ी  मौज़ूद  रहती  आगे >

मुक्त पहचान पँजीयन