लगा कि ये साल वी सुक्खा-सुखियाँ ही निकल जाने को है, पर वह न हुआ । अपना आज कुछ ऎसा डौल लग गया कि, लगदा है आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा ।

ऒऎ कोई नहीं, वो तो जैसे ही सन्दीप ने एक ठोका, यो लाग्या कि अब आगया मौका. लेकिन जैसे ही भाई परभजोत ने तीसरा ठोका,  दिल इस कदर बल्ले बल्ले होया, कि इक माहौल बन गया.. ना जी, ये तो सेलेब्रेट का मामला है,  मौका और माहौल दोनों आन मिले उम्मीद थी कि गला-वला तर करने को आज गृह मँत्रालय से अँतरिम राहत मिल जायेगी । पर सनम जी ?

वह तो झू्ठियों की सरदार निकलीं । चहक कर उचकीं, ऒऎ क्या बात है, " चक दे इँडिया !" और पलट कर मेरी  चहक को छील कर धर दिहिन, बड़ी चालाकी से चर्राती भयीं, ऒऎ ज़िन्दगी का मज़ा एक बार होश में लेकर भी देख.. ज़रूरी  है  कि  खुशी  के  इज़हार में हमेशा  बेहोश  होकर  ही  लोटेगा ? अच्छा चलो  परमिशन  दिया.. लेकिन  तुम्हारा मद्यप्राशन कौन करायेगा, जरा हम भी तो देखें ? ( इसके जिम्मेदार आप हो समीर भाई, विन्टेज़  की एक  बोतलिया बेचारी तुमसे सीलभँग करवाने को अहिल्या बनी एक बरिस से तैयार बईठी है, अपने इंडिया आगे और है