बस यूँ ही निट्ठल्ला

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    मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है...

    एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़  लिहै  से  उनकी  अकड़  की ...
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    आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो......

    इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी की भरपायी करने की ठान रखी थी, सोचा कि आज दो नये पोस्ट अवश्य दूँगा । मेरे सँकल्प को जब नींद टँगड़ी मारने लगी तो, सोने से पहले अम्मा को हिदायद दी कि, एक ज़रूरी काम है.. सो मुझे तीन बजे जगा दीजियेगा । घर में बूढ़े-बुज़ुर्ग होने का यह एक फायदा तो है ही कि, उनसे ऍलार्म का काम बखूबी लिया जा सकता है । फिर यह तो ठहरीं, ढीले स्प्रिंग की बिगड़ी हुई घड़ी ! अल्ल्सुबह पौने तीन बजे ही इन्होंनें टुन्नु टुन्नु की ऎ...
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    बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. .....

     बेशक पोस्ट टिप्पणी ठेलोऽऽऽऽ.. निट्ठल्ला ये कैताऽ पर ऎसी टुँगी कभी न छोड़ो, जिससे दिल दुखे व भगदड़ मचता हालिया घटनाक्रम से तो यही लग रहा है कि “चलो रसातल ओर हो ब्लॉगर .. चलो रसातल ओर“ भविष्य का हमारा ब्लॉगगीत बन जायेगा ! फोटो ऎडिटिंग टूल्स के साथ यह निट्ठल्लाकारी खींच-तान उन्हीं अनमने क्षणों की देन है । कभी “एकला चोलो रे“ से ब्लॉगिंग आरँभ किया था लोग जुड़ते गये, हौसला बढ़ता गया । लगता है कि मैं खुद बखुद अपने क...
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    मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ......

    इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य से भी अधिक हिट होने की सँभावना रखता है ( चाहें तो आप अपनी प्रति सुरक्षित करवा लें ) साथ ही मैं मैं रवि छत्तीसगढ़ी रवि रतलामी भाई से अनुरोध करूँगा कि यदि वह  मेरी  हरकतों  को  अनदेखा  न  कर स...
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डा. अनुराग के बचपन पर कराह उठा यह पचपन

Feb 10th

★ डा. अमर कुमार ● [...] | 70 ने पढ़ा

17 टिप्पणियाँ

जैसे जैसे डा. अनुराग की पिछली ज़बरदस्त पोस्ट को बाँचता जाता, दिल से.. हमारे वाले दिल से, कराह उठ रही थी, “हाय अमर तुम न हुये ।” ऎ भाई कोई यहीं खुन्नुस न निकाल लेना, कि “ अगर होते तो, क्या उखाड़ लेते ?” एकदम सच बात है, मैं क्या कर लेता.. ?

मैं बचपन में ही चुगद था, और विद्वान टिप्पणीकारों के मत में, सो तो अब तक हूँ । अब यह शब्द इतना सहज लगता है.. कि फ़ौरन ही हर ऎसे टिप्पणीकार की पारखी निगाहों का फ़ालोअर बन जाता हूँ । मेरे बाबा कोई चीज बरबाद होते हुये देख कहते.." सकल वस्तु संग्रह करहूँ आवैहिं एकु दिन काम, समय पड़े पर ना मिले माटिहूँ खरचे दाम । " सो अपना अमूल्य ( दो कौड़ी से कुछ कम.. का एक नाप ! ) मानव मष्तिष्क मौका-ए-नज़ाकत वा वक़्त-ए-ज़रूरत पर काम आने के लिये सहेज कर रखना अपना परम कर्तव्य समझता । ज़्यादा दिमाग लगाने से परहेज़ करता, " अरे होगा न… मुझे क्या ? " जैसा भाव मुझे दुलराता रहता । बस मियाँ ठूंस के खाओ और मस्त रहो । आपके सामने है.. खेलेंगे कूदेंगे वाले नवाब बने ऎंठ रहे हैं.. और पढ़े लिखे वाले.. रहे चप्पल चटकाय

अब तो खैर, ठूँसना ठूँसाना ग़ुज़रे ज़माने की बातें आगे और है

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तुम पार नेट परमेश्वर तुम ही नेट पिता

Jan 18th

★ डा. अमर कुमार ● [...] | 88 ने पढ़ा

1 टिप्पणी

 ॐ जय गूगल हरे, स्वामी जय गूगल हरे फ़्रस्ट (एटेड ) जनों के संकट, त्रस्त जनों के संकट एक क्लिक में दूर करे ॐ जय गूगल हरे… जो ध्यावै सो पावै दूर होवै शंका, स्वामी दूर होवै शंका सब इन्फ़ो घर आवै, सब इन्फ़ो घर आवै कष्ट मिटै मन का ॐ जय गूगल हरे… नेट पिता तुम मेरे शरण गहूं किसकी, स्वामी शरण गहूं किसकी तुम बिन और न दूजा, तेरे बिन और न दूजा होप करूं किसकी ॐ जय गूगल हरे… तुम पूरन हो खोजक तुम वेबसाइटयामी, स्वामी तुम वेबसाइटयामी पार नेट परमेश्वर, पार नेट परमेश्वर तुम सबके स्वामी ॐ जय गूगल हरे… तुम ब्लागर. के फ़ादर तुम ही इक सर्चा, स्वामी तुम ही इक सर्चा मैं मूरख हूं सर्चर, मैं मूरख हूं सर्चर कृपा करो भरता ॐ जय गूगल हरे… तुम सर्वर के सर्वर सबके डाटापति, स्वामी सबके डाटापति किस विधि एन्टर मारूं, किस विधि एन्टर मारूं तुममें मैं कुमति ॐ जय गूगल हरे… दीनबंधु दु:खहर्ता खोजक तुम मेरे, स्वामी शोधक तुम मेरे अपने फ़ण्डे दिखाओ, कुछ तो टिप्पणी दिलाओ साइट खड़ा तेरे ॐ जय गूगल हरे… बोरियत तुम मिटाओ टेंशन हरो देवा, स्वामी टेंशन हरो देवा गूगल अकाउण्ट बनाया गूगल अकाउण्ट बनाया पाया ब्लागिंग मेवा स्वामी पाया ब्लागिंग आगे और है

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टाइमपास

इतना विशाल देश.. क्या अकेले मेरे बस में ?

Jan 12th

★ डा. अमर कुमार ● [...] | 29 ने पढ़ा

15 टिप्पणियाँ

हरतरफ़ चर्चा है, कि देश मुसीबत में हैं, आतंकी इसे रौंद रहे हैं, घोटाले इसे लील रहे हैं ! सत्यम भी आख़िरकार असत्यम साबित हो रहा है ।  अब, भला आप ही बताइये, मैं अकेला क्या कर सकता हूँ ?  कल जोड़ने बैठा तो .. देश की आबादी निकली : 100 करोड़ जिसमें 9 करोड़ तो सेवानिवृत हैं, जिनसे शायद ही कोई उम्मीद हो नौकरीपेशा वर्ग में केन्द्रीय कर्मचारी ठहरे 17 करोड़ और राज्य कर्मचारी हैं 30 करोड़ इनमें शायद ही कोई काम करता हो ? और.. हमारे यहाँ हैं 1 करोड़ आई० टी० प्रोफ़ेशनल !  इनमें अपने देश के लिये कौन काम करता है, जी ?

18 करोड़ तो बेचारे अभी स्कूलों में ही हैं, इनसे क्या होना है ?   इन 8 करोड़ दुधमुँहों को, जो अभी 5 वर्ष भी पार नहीं कर पायें हैं..तो अलग ही रखिये ! यह 15 करोड़ बेरोज़ग़ार अपनी ही चिन्ता में हैं… देश के लिये…  बाद में देखा जायेगा ! और यह 1.2  करोड़ बीमार तो अस्पतालों में कभी  भी  देखे जा सकते हैं, आतंकवादी इन्हें भले न बख़्शें, पर यह बेचारे अभी कुछ करने लायक ही नहीं हैं , सो इनको तो आप फ़िलहाल बख़्श ही दो ! जरा जोड़िये तो… कितने हुये ?  98 करोड़.. आगे और है

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टाइमपास

अपनी उनके संग सुरक्षित ड्राइविंग … …

Jan 8th

★ डा. अमर कुमार ● [...] | 34 ने पढ़ा

8 टिप्पणियाँ

मोबाइल के उपयोग एवं ड्राइविंग के समय टेप से छेड़छाड़ ( डा. अनुराग ) के बाद आपकी उनकी चटर चटर ही एक्सीडेन्ट का एक और मुख्य कारण है ! अपुन के उल्हासनगर के कारग़ुज़ारों ने अनोखा सीट-बेल्ट इज़ाद किया है, जी हाँ.. ख़ालिस Made in USA ! बगल में बैठी ख़ूबसूरत दुर्घटना से आपका कान औ’ ध्यान सुरक्षित ..  फिर अगली कोई अनहोनी तो अन + होनी ही समझिये ! पेटीकोट सरकार मान्यता प्राप्त है यह ! इसकी अग्रिम बुकिंग धड़ल्ले से चल रही है, संपर्क करें – अभिषेक ओझा,  अथवा श्री ताऊ रामपुरिया इंदौर वाले बाँटो और दुआयें लो
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टाइमपास

वो अन्डरस्टैंडिंग थी और ये सियासत है !

Dec 22nd

★ डा. अमर कुमार ● [...] | 39 ने पढ़ा

1 टिप्पणी

स्थान: सीमा चौकी, इस बार उत्तर-पश्चिम क्षेत्र बात बात पर उबल पड़ने और भारत माँ की सौगंध लेने की आदत के चलते रामनिहारी जाटव अपने बटालियन में रामबवाली भारती पुकारे जाते थे ! हमारे चरित्रनायक रामबवाली जी अब लांसनायक भारती के नाम से पुकारे जाने लगे हैं । दीपावली मनाने दो वर्ष बाद छुट्टियों में घर आये हैं । सब ठीक ठाक गुज़र रहा था, मात्र चार दिन ही रह गये थे, कि बेस से वारंट आगया.. … रिपोर्ट इमिडीयेटली ! बीबी ने उनका सामान बाँधा, उन्होंनें कुलदेवी के सम्मुख सिर पर क़फ़न बाँधा और चल पड़े लाम पर ! रिपोर्टिंग की औपचारिकतायें पूरी हुईं, एक संक्षिप्त मीटिंग… और यह तय पाया गया कि जिसको जिस क्षेत्र की अधिक जानकारी है,उन्हें वहीं भेजा जाय !    आज लगभग दस दिनों बाद कुछ लिखने बैठा हूँ |ये अन्डरस्टैंडिंग है…का दूसरा भाग पूरा करना शेष था । ब्लागर की सीमित दुनिया में सुरक्षा संचेतना सुनामी या कहिये कापी-पेस्ट काँव-काँव के थमने की प्रतीक्षा में स्वामी का यह आम आदमी पाँच दिनों के लिये टीकमगढ़ के बंज़र की खाक छान आया ! बस ऎंवेंई ही… वहाँ की दुरावस्था पर बहुत कुछ सुना था, सो देख भी आया ! वहीं पाकिस्तान के विषय में गाम की आगे और है

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चैट्क्क.. डोन्ट वरी फ़ॅऽर इट, अंकल !

Dec 8th

★ डा. अमर कुमार ● [...] | 26 ने पढ़ा

6 टिप्पणियाँ

यह विषय पड़ा तो बहुत दिनों से था… पर वही सनातन रोना, कुछ असलियत का और कुछ फ़ैशन में, बोले तो.. समय का टोटा, वह तो आपके पास भी होगा ! ब्लागिंग और लिखने का विषय ?  अरे, राम भजो… . जिस दिशा में  भी नज़र डालो, विषय  ललकार  रहे हैं ! ब्लागर वही, जो बात  पकड़ बतंगड़ बनाये ! टैग जो मन आये, वही घुसेड़ दो… संस्मरण, संवेदना, हलचल, विविध, व्यंग्य या कुछ भी ? अपुन के समीर भाई जी ने कहीं लिखेला है, ” ब्लागिंग की  लत लग भर जाये, फिर तो सोते में, जागते हुये , रास्ते में, श्मशान में, लड़की में, कड़की में.. जित देखो ब्लाग सब्जेक्ट , जैसे मीरा के कान्हा ! उन्होंने तो अपना पक्का इंतज़ाम कर ही लिया है..लोकल ट्रेन के डिब्बों में भी अपना माल ताड़ लेते हैं, और मसाला लाइब्रेरी में मिल जाता है, सेफ़ हैं.. लकी हैं ! पर,  मुझे तो पहले का सोचा हुआ हर एक नुक्ता..  जैसे अब कुरेद रहा हो !हुआ यह कि चिट्ठाचर्चा  के जिसका जितना आँचल था, उतनी ही सौग़ात मिली  पर मेरी एक टिप्पणी दर्ज़ होगी, “…..  लट्ठ ताऊ का पेटेन्ट है, राज भाटिया छुट्टियों पर निकले हैं, और यहाँ.. बिटिया को उड़ान भरने की लेट आगे और है

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सनद रहे कि यह नकल है..

Dec 7th

★ डा. अमर कुमार ● [...] | 75 ने पढ़ा

15 टिप्पणियाँ

अब ढूँढ़िये, इसका मूल लेखक ? यदि आप जागरूक पाठक हैं, तो पहचान ही जायेंगे.. इस पोस्ट के मूल लेखक को… नहीं पहचाना ?  कोई बात नहीं., फिर तो.. यह रचना मेरा हिन्दी के प्रसार में योगदान माना जाये                                                            और इस नक्काल के पोस्ट-मर्म को अनदेखा कर दें ओ पैणचो मंत्री लोकी की करदे ने, हुण पता लगिया । ओ पता तां पैलां ही सी, पर अद्दे जाके दिसदा पिया वे। ये वो संवाद थे जो मुंबई के किंग्स सर्कल से सटे पंजाबी कॉलोनी में एक दुकान पर चल रहे थे। तीन लोगों के ये हिंदी-पंजाबी मिश्रित संवाद इतने रोचक थे कि मैने इनकी कुछ बातें अपने अदने नोकिया 2626 पर रिकॉर्ड कर लिया लेकिन अगल बगल उठ रहे ट्रकों और काली-पीली टैक्सियों के उठते शोर के बीच सब कुछ दब गया। अपने एक मित्र के साथ एक दुकान पर कुछ काम से गया था, वहीं पर ये रोचक संवाद सुनने मिले। ये रोचक संवाद जरा आप Text में देखें । पहला – ओ साले मंत्री अपणी मां ** रहे सी, पैण चो कर (घर) विच् टांगा विच टांगा डाल के पये होणगे मां दे लौ* दूसरा – उन्ना नु लोकां नाल की मतलब, माचो खुद ते ऐश-उश करांगे पांवै ( आगे और है

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    • rakhshanda: आप चाहे कम लिखें..लेकिन अंदाज़ यही निराला होना चाहिए.......
    • rakhshanda: bahut khoob...ye to kamaal ka robot है, वैसे सच कहूँ तो जब आप लिखते हैं..चाहे वो कोई भी टोपिक क्यों ...
    • satish saxena: वाह भाई जी ! आनंद आ गया , इसे यहाँ मत चला देना सारा ब्लाग जगत ही बंद करा दोगे :-) बड़े दिन बाद आपको ...
    • विवेक रस्तोगी: लंतरानी अच्छी है, और ई रोबट को जनपथ पर बैठा दिया जाये तो मजा आये। :)...
    • डा. अमर कुमार: प्रवीण जी, आइन्दा ध्यान रखियेगा !
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    • यह, आप और....., पैचान कौन ?

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      बहुत शुक्रिया..बड़ी मेहरबानी.
    • दर दर की चिप्पियाँ

      Blogger Elite Plebian अमिताभ बच्चन अल-क़ायदा आत्मग्लानि इलाहाबादी उनकी टिप्पणियों पर उर्दू कभी कभी मेरे दिल में... काला कोट काहे-भाई-काहे-परेशान-है खींचाताना चिट्ठाचर्चा संदर्भ चिट्ठा्चर्चा सँदर्भ टाइमपास टिप्पणी दीन और दाढ़ी न जाने क्यों परिभाषित न हो सका नास्तिक चिंतक निट्ठल्लेखंडे पाकिस्तान पूर्णेंदु सम्मान बनर-खुज़ली बात बेबाक बुरबकई बेतक़ल्लुफ़ बेनज़ीर बेसिर- पैर की भात दाल मिनी पोस्ट मिलीजुली सरकार मूड मेरा लिखा मत पढ़ो मेरी पड़ोसन मोमिन योनिरह्स्यकम सँग साथी सँगी साथी संदर्भहीन व्याख्यायें सत्ता के संघर्ष सहपाठी होली ख़ुदा के लिये फ़ुरसतिया
    • …… और चिन्दियाँ

      आपबीती उर्दू किसकी ज़ुबाँ कभी कभी मेरे दिल में... कमज़ोर सरकारों पर तलाश साफ़ सुथरे दिमाग की निट्ठल्लाकारी पाकिस्तान तलक बुरबकई बेतक़ल्लुफ़ ब्लॅगिया का झस मिनी पोस्ट मेरी लँतरानियाँ मॉडरेशन मॉडरेशन हरकत-उल-अमेरिका होली
    • नवी ताज़ी दिलखुश टिप्पणी

      • निठल्ले का भी कोई परिचय on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • आँखों में भरे पानी का कौतुक on मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है
      • zeal on बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. ..
      • rakhshanda on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • rakhshanda on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • satish saxena on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • विवेक रस्तोगी on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • डा. अमर कुमार on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • डा. अमर कुमार on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
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      • झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. ..
      • “… .. ….. .. … .. ? ”
      • आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो…
      • मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ…
      • ग़र होश जरा सा अब तक है फ़ाग़ी.. होश तू अपना तौल !
      • मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है
      • चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो
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