लै भाई, मन्नैं बी इक पहेल्ली पूछ लैण दे ।
Jun 1st
धन्यवाद भाई जी, तन्नैं होश दिलायी के बिन पहेल्ली पुच्छै इह निट्ठल्ले को ब्लागर मानता ए कोण्या ? भाई, आप बात तो ठीक कहवै सौं, बुरी सँगत में पड़कै, मैं भी बड्डी बड्डी पोस्ट लिखण लाग्यै लग सै । जे पहेल्ली ना पुच्छी ते फेर ब्लागर किस्सा ? आज रस्म अदा कैण वास्ते इक निट्ठल्ली पहेल्ली हो जाण दै । मन्नैं इनाम वीनाम देना कोणी, मर्ज़ी हो बूझ.. ना मर्ज़ी बने तो टिप्पण आले बक्से से परे नट जा । ये रही अपणी पहेल्ली..
एक मारे से मरा काण खोल के पढ लै, एक मारे से मरा.. दो सँदेशे से मरे और सँदेशी मरा जब तीन चले परदेश ते कुल पहेल्ली यो करके बनी के
एक मारे से मरा दो सँदेशे से मरे सँदेशी मरा कब ? जब तीन चले परदेश
मुस्किल आण पडी हो ते यो बता दूँ के… यो पहेल्ली लाल लँगोटे वाले लँगूर के बास के खानदानी से मतलब राख्यै सै !
लगे हाथ निट्ठल्ले का ग़ज़नी के स्क्रीन टस्ट से रिजिक्ट फोट्टू भी देखता जा, यो पहेल्ली का हिस्सा नाय
..
बाँटो और दुआयें लोआज बड़े खुश लग रहे हो ?
May 26th
डिस्क्लेमर : यह पोस्ट श्री बज्राँग बली के नाम पर आरँभ किया जा रहा है, अनायास बिजली गुल हो जाने की दशा में पोस्ट पूरी न हो पाने का सम्पूर्ण उत्तरदायित्व केन्द्र व निष्कामी राज्य सरकार का होगा । इसका मायाराज से कोई लेना देना नहीं है !
रायबरेलीवासी मतदान के तत्काल बाद से विद्युतबाधा के बँधक बने हैं । सोनिया भाभी से माया ननदिया को उचित नेग मिलने तक यह तमँचा लगा रहेगा । अतः ब्लागिंग की बत्ती भी गुल है ! अफ़सरान के चेहरे की बत्ती गुल है, चाटुकारों की बत्ती गुल है । हे कपि, समय पड़े पर तू ओबामा के सँग हो लिया और, कुसमय पर अपने देशी अडवानी श्रीराम चरण कमल रज से ही रूठ गया । उनकी छोड़, हम दीनों की तो सुन ले..
“ मुठिका एक महा कपि हनी ।
रुधिर बमत धरनीं ढनमनी ॥ “
अरर..रर..र.. बिजली जाने ही वाली है, आने का भरोसा भले ही न हो.. जाने का पूरा भरोसा रहता है । यानि कि कार्यक्षमता में पचास फ़ीसदी के सुधार से आप मुकर नहीं सकते । लुप्प लुप्प होन लगा भाई.. जल्दी समेट लें, जाण वाली है । जाने दो, मेरा क्या ?
आपको ही यह पोस्ट पूरी न पढ़ने को न आगे और है
विरोध का यह तरीका, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका
May 20th
He is obselete, who is he ?
May 15th
यूँ तो अपन को किसी लफ़ड़े में पड़ने की आदत तो है, नहीं ? अब तक तक तो आप भी जान गये होंगे,कि, मैं अपना दामन बचा कर दूर से तमाशा देखने वाला एक आम शहरी आदमी हूँ । चाहें तो, मुझे शरीफ़ भी कह लीजिये, तो भी मैं बुरा न मानने का ! इसलिये मैं डा. अरविन्द के यहाँ से आते शोर से अपने को अलग ही रखे रहा । एक ब्लागर दूसरे ब्लागर को दे ही क्या सकता है, भला ? फ़क़त दो चार टिप्पणी या गाली गलौज़ तो आम बात है, ऎसे शैतानी पोस्ट पर भी यदि साधु वाद आ जाय.. तो अपवाद ही मानो ! अपवाद यूँ कि, साहित्यिक गोष्ठियों जैसी नेटवर्किंग यहाँ उतनी परिपक्व न हो पायी है, या फिर कोई हिन्दी ब्लागर अपने सम्मान समारोह का आयोजन करवा कर उसमें पैसा लगाने जैसा ज़ोखिम अभी तो नहीं ही ले रहा है ! आगे की, ….?… जाने ( इंडिया सेक्यूलर या नान-सेक्यूलर, जब तक यह सुप्रीम कोर्ट तय करें.. तब तक यह स्थान रिक्त ही रहने दो ) ! एक ब्लागर की पहचान खतरे में है, चलो बड़ा अच्छा है.. यह गवारा न हुआ
दूर की कौड़ी निहार रहे.. या अपने ब्लागरीय सँदर्भ तलाश रहे हों, भाई ज़ान आगे और है
आख़िरी ज़रूरत – µ पोस्ट
May 6th
एक सफल मनुष्य, जो अपने जीवन में हर कुछ हासिल कर चुका हो, अब और क्या चाह सकता है ?
अपने जीवित रहने के चँद ज़रूरतें, और कुछ नहीं ! यानि एक डाक्टर, एक वकील और ज़ेड सेक्यूरिटी !
Technorati Tags: ज़रूरतें,Z catagory,मस्ती,Micro Post,माइक्रो पोस्ट,Blogger,हिन्दी,Just in jest बाँटो और दुआयें लोटिपेर तंत्र के अघोरी
Apr 28th
अमारा मौसी का बेटी
Apr 22nd
स्पीच का बात को पिरेस वाला इतना मच मच मचायेला कि मामला सीरियस हो रैली है, मैडम का वास्ते ! झप्पी बोले तो.. झप्पी ! अक्खा इंडिया में देखो.. पिरेस में गँदा लोग भरेला है, बाप ! तू जा के मैडम को सारी बोल दे , सरकिट !
सरकिट गोल ? अमर सिंग अपुन को इच सरकिट बना डाला.. अपना पालिटिक्स में ! माफ़ी माँग ले, सँजू बाबा !
बाँटो और दुआयें लो










