बस यूँ ही निट्ठल्ला

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    बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. .....

     बेशक पोस्ट टिप्पणी ठेलोऽऽऽऽ.. निट्ठल्ला ये कैताऽ पर ऎसी टुँगी कभी न छोड़ो, जिससे दिल दुखे व भगदड़ मचता हालिया घटनाक्रम से तो यही लग रहा है कि “चलो रसातल ओर हो ब्लॉगर .. चलो रसातल ओर“ भविष्य का हमारा ब्लॉगगीत बन जायेगा ! फोटो ऎडिटिंग टूल्स के साथ यह निट्ठल्लाकारी खींच-तान उन्हीं अनमने क्षणों की देन है । कभी “एकला चोलो रे“ से ब्लॉगिंग आरँभ किया था लोग जुड़ते गये, हौसला बढ़ता गया । लगता है कि मैं खुद बखुद अपने क...
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    मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ......

    इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य से भी अधिक हिट होने की सँभावना रखता है ( चाहें तो आप अपनी प्रति सुरक्षित करवा लें ) साथ ही मैं मैं रवि छत्तीसगढ़ी रवि रतलामी भाई से अनुरोध करूँगा कि यदि वह  मेरी  हरकतों  को  अनदेखा  न  कर स...
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    आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो......

    इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी की भरपायी करने की ठान रखी थी, सोचा कि आज दो नये पोस्ट अवश्य दूँगा । मेरे सँकल्प को जब नींद टँगड़ी मारने लगी तो, सोने से पहले अम्मा को हिदायद दी कि, एक ज़रूरी काम है.. सो मुझे तीन बजे जगा दीजियेगा । घर में बूढ़े-बुज़ुर्ग होने का यह एक फायदा तो है ही कि, उनसे ऍलार्म का काम बखूबी लिया जा सकता है । फिर यह तो ठहरीं, ढीले स्प्रिंग की बिगड़ी हुई घड़ी ! अल्ल्सुबह पौने तीन बजे ही इन्होंनें टुन्नु टुन्नु की ऎ...
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    मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है...

    एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो  वहू  ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़  लिहै  से  उनकी  अकड़  की ...
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चलो, मेरा लिखा मत पढ़ो, पर इसको तो न छोड़ो

Sep 7th

★ डा. अमर कुमार ● बेतक़ल्लुफ़ | 154 ने पढ़ा

29 टिप्पणियाँ

जब कौल कर ही लिया है, तो मैं आज कुछ न लिखूँगा.. तो आप भी कुछ न पढ़ना । आपको ब्लागवाणी पर यह ज़ब्बर टाइप शीर्षक दिखला कर यूँ ही फुसला कर बुला लूँ, और यहाँ एक वाह-वाह आलेख पकड़ा दूँ… यह  हमसे  न होगा ! अपने  मुँह मियाँ  मिट्ठू… वाः वाः कौन कहता है, कि  आपने  कभी  कोई  वाह-वाह पोस्ट भी लिखी है ? किसीके यह पूछने से पहले ही, यह बता देता हूँ कि, भाई इब मन्नैं भी एक गुट बना लिया है । आठ-दस फोन नम्बर भी बटोर लिया है । चाहोगे तो अपने पोस्ट किये जाने वाली टिप्पणी का डिक्टेशन भी दे दूँगा, मुफ़्त.. मुफ़्त.. मुफ़्त.. ! भले आप दरिया किनारे जाकर मुर्गी के अँडे छील कर उबाल लो, उस  उबले  अँडे का आमलेट तक हम्मैं निगलवा दो… लेकिन यह जान लो कि मेरी तो आठ-दस रेडीमेड वाह-वाह टिप्पणी  पक्की  ही  है । हमरा एक निर्गुट कबीर गैंग जो है । इसके सभी निर्गुणिया सदस्य , अपने  लोगों  के  लिये  वाह-वाह  हरमुनिया बजाने में निष्ठावान गुणी हैं । मैं अँट-शँट नहीं बक रहा भाई.. और  न  ही  मेरे  पास  इस  पोस्ट  को लँबा खींचने की फ़ुरसतिया-पावर है । डारविन के रिश्ते से स्वाइन जी कभी तो हमारे आगे और है
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टाइमपास, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका, बनर-खुज़ली, मेरा लिखा मत पढ़ो

माडरेशन की प्रतीक्षा में

Sep 6th

★ डा. अमर कुमार ● बेतक़ल्लुफ़ | 85 ने पढ़ा

10 टिप्पणियाँ

इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी, दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी । पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !" दूसरा उखड़ गया, " भला ऎसा कैसे हो सकता है ?" हो सकता है.. नहीं हो सकता है कि तू तू मैं मैं चलने लगी, दस बीस तमाशबीन इकट्ठे हो गये । पहले ने कहा, " चाहे तो शर्त लगा ले ।" दूसरा भड़क गया, " ऎसी अनहोनी पर शर्त क्यों लगा लूँ ?" अब शर्त लगा ले..  और शर्त क्यों लगा लूँ.. की नोंक-झोंक चलने लगी । किसी ने सुझाया, अरे आज़मा ले भाई , शर्त लगाने में क्या जाता है ? जो हारेगा , आख़िर उसी को पैसा भी तो भरना पड़ेगा कि नहीं ? बीस रूपये की शर्त लग गयी । अगर तू पेशाब में भीग गया तो बीस रूपये तेरे, वरना तुम्हें बीस रूपये देने पड़ेंगे । चल ठीक है, चल ठीक है ! पहला उसे कोने में ले गया, और उसके ऊपर झर झर मूत दिया । दूसरा सिर से पाँव तक तर हो गया । पर, आगे और है

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उनकी टिप्पणियों पर, खींचाताना, बात बेबाक, बेतक़ल्लुफ़

चले जाना नहीं, होश उड़ाय के

Aug 23rd

★ डा. अमर कुमार ● बेतक़ल्लुफ़ | 99 ने पढ़ा

16 टिप्पणियाँ

मेरे मित्र डा. एस.एम. सिंह, यहाँ एक सफल आर्थोपेडिक सर्ज़न हैं । कभी वह कार्टूनिंग में दखल रखा करते थे । पर जैसा कि इस पेशे में होता है , अधिकाँश जन अपने शौक, ललित प्रतिभा और मनोलालसा को इस पेशे की बलि देने से रोक नहीं पाते । लगातार उकसाये जाने पर वह पिछले कुछ वर्षों से छिटपुट स्तर पर सक्रिय हो पाये हैं । कल्पना के धनी हैं, फिर भी शायद सौजन्यवश मुझसे भी कार्टून आइडिया की माँग कर बैठते हैं । और उसे पूरा भी करते हैं । प्रस्तुत है, उनके द्वारा रेखाँकित यह बानगी !

बहुधा यह सुनने में आता है, कि कुछ लेन-देन के मसलों को लेकर मरीज़ आपरेशन टेबल से वापस आ जाता है, यह कटाक्ष उधर ही है । यदि कोई आहत होता है, तो वह अपनी जिम्मेदारी पर मनमर्ज़ी अनुसार आहत होने को पूर्णतया स्वतँत्र है । मूर्छा सुँघाय के, होश उड़ाय कैऽ,चले नहीं जाना… ओ डाक्टर बेदर्दी ! मित्रोऽह् भवन्तु सुखिन्ः सर्वो भ्रूयात् शुभम् ! इति निट्ठलस्य् प्रगल्भम् ॥

Technorati Tags: Hindi Bloggers,Hindi Satire,Blogspot Cartoons,Anesthesia,Jestful Leisure बाँटो और दुआयें लो
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बुरबकई

भईया, तनि हमारौ एकु फोटू चीन्ह देयो

Jul 29th

★ डा. अमर कुमार ● बेतक़ल्लुफ़ | 70 ने पढ़ा

12 टिप्पणियाँ

पहेली बूझाने मैं तो आयी.. कहते हैं इसको चीन्हा-चिन्हाई ! चीन्हा-चिन्हाई … चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू ब्लागिंग भई है, बमचिकाचिक…  त हमहूँ भये हैं, बमचिकाचिक । बमचिकाचिक देखो फोटू बमचिकाचिक ! चीन्हा-चिन्हाई … चीन्हा-चिन्हाईऽऽ.. चीन्हा-चिन्हाई ! रू रू रू आजकल बड़ा बूझा और बुझाया  जा रहा है, सोचा निट्ठल्ले बैईठ से तो अच्छा है कि, हमहूँ कुछौ बूझि जाँचि लेयी..    कल हो ना हो ! वो क्या है कि,

कहते हैं ना ..यह ब्लागर की बस्ती है..यहाँ पोस्ट मँहगी और टिप्पणियाँ सस्ती है ।                                       सो, अँतरिम राहत के लिये  एक सस्ते दरों का पोस्ट दिया जा रहा है, निर्वाह कीजिये ।

यह ख़ानम बीते हुये ज़माने की खँडहर नहीं, क्योंकि यह स्वयँ ही कहती हैं कि, " मैं तो नब्बे वर्ष की ज़वान हूँ ! " अपने को भारत का प्रथम ’ न जानि क्या कुछ ’  बताती हैं । इनका नाम है.. उड़ी बाबा, ज़वाब तो आपको देना है । ज्ञानियों के तरकश तो तीरों से ख़ाली हो चुके हैं, इसलिये यहाँ अज्ञानियों का तुक्का भी बिना किसी मर्डरेशन के चलेगा । ज़रूरत बस इतनी ही है कि, चलाइये तो सही ?

बाँटो और दुआयें लो
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बुरबकई

हाहा ही ही.. बजट्ट अली बजट्ट अली, हो बजट्ट अली

Jul 6th

★ डा. अमर कुमार ● बेतक़ल्लुफ़ | 144 ने पढ़ा

18 टिप्पणियाँ

सोचा कुछ – हुआ कुछ और ही है निट्ठल्लों सँग ही ऎसा होता क्यूँ है सोचा कि कम्पू बेबी को हाथ न लगाऊँगा अपने सड़े विचारों का अचार पक न जाये जब तक शब्दों की खटास में तनिक मिठास न आये तब तक बेटी को फोन लगाया, उछल पड़ी " पापा सच्चीऽऽ ? बेटे को मेसेज़ किया, पलटवार हुआ " देखें कब तक ? बिसूरता बुद्धू बक्सा खिल पड़ा, बोला आजा मेरे कोल आ साड्डे नाल मनों अतिरँजन है, है मामला तेरे च्वायस का तुझे वधू बालिका दिखाऊँ, या गहनों से अटी गरीबी से हरसाऊँ नहीं समाचार दिखाओ यानि सम अचार, मैं जिससे रोटी तो खाऊँ घणे फिट टाइम तू आया, बज़ट आण आला है, बोल वोई दिखाऊँ बजट क्या रे ? वह तो आ भी गया.. आकर जाने कब का चला भी गया गिली गिली बूम पटाक हुर्र हुश्श छूः प्रोणोब काकू ने सूँ चिड़िया उड़ा दिया अँय ? अखिल भारतीय फ़िनेन्स मेनेस्टर प्रोणोब दा ने दू मीनिट में शोबका चिरीआ उरा दीया अब तो मरे  भूखन भाय, तेखनोई गोलमगोल कोरता था, गेहूँ सेरे एक रुपिया तीन झुठलाय दिया, अस बुद्धू बक्सा दिहौ चिढ़ाय मुझ सा बुद्धू ना जग में पाय डाक्टर साहेब गयो खिसियाय लौटे ब्लागर यों घर को आगे और है
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Amar Kumar has sent you a cold drink

Jun 21st

★ डा. अमर कुमार ● बेतक़ल्लुफ़ | 61 ने पढ़ा

13 टिप्पणियाँ

पहिले निट्ठल्ला फोटुओं का इन्ट्राडेक्सन देगा : उसके बाद लिक्खेंगा.. लीखने का कुछ नेंईं जी, ईहाँ की तो पँच लाइन ही है.. “ सोचेला नहीं.. बस ठेलेला “ और  जब सर पे ख्याल ही न मंडराएं, और बिल्कुल रहा ना जाए , तो ? तो क्या, यदि आप भी कोल्ड ड्रिंक देखि के चले आये हैं, तो यह ब्ला ब्ला ब्लाग भी झेलिये..

 

आजकल अपुन के मेल बाक्स में कोल्ड-ड्रिंक की लूट मची है  ! मेरे ढाँचें का डाक्टरी वाला टेम्पलेट अँग्रेज़ी से भले बना हो, पर कंटेन्ट तो देसी रहेगा ! जैसे दूल्हे राजा का कितना भी ऋँगार कर देयो, उनका बाबू राजा बनाय के जयमाल के लिये ऊँची कुर्सी पर बईठाय देयो ! चारों तरफ़ फ़ोकस ही फ़ोकस.. जिज्जा जी, ही ही ही.. जीजाऽऽऽ जिही झी ही ही ही !  लेकिन जईसे ही जीजा का एकु मच्छर काटिस, बिलबिलाय गये.. अउर सीधै मच्छराइन बहन जी तक पहुँच गये, “ चटाक ! धात्त त्तेरी..  की .. .औंऽऽ ! “ औकात इसी को कहते होंगे, शायद ?

यही हाल अपना है.. कोल्ड ड्रिंक देखि के बुखार आता है.. भले लस्सी दे दो.. या शिकंज़ी की बात ही कुछ और है.. सत्तू का शरबत भी मँज़ूर.. बेल का शरबत मिलि जाय, समझो कि वाह वाह आगे और है

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बच्चा बच्चा… बूढ़ा बूढ़ा… हाल तुम्हारा जाने है

Jun 5th

★ डा. अमर कुमार ● बेतक़ल्लुफ़ | 81 ने पढ़ा

13 टिप्पणियाँ

कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप  यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक साँप निकला था, और मैंने  उसे भाग जाने दिया । अभी भी वह यहीं है, किसी ठँडी जगह में.. । रिशि मुझे नसीहत दे रहे थे, कि आपने ’ उसे नहीं मारना  ’ कह कर ठीक नहीं किया । मैं उनको धरती पर साँपों के होने का महत्व समझा रहा था, इनका भी जैविक पर्यावरण में एक अहम किरदार है । इतने में रिशि महाशय मौजिया पड़े फिर तो अपने लीडर्स इनसे ज़्यादा खतरनाक हैं, न अँकल ? मैं चौंकता हूँ, इतना सा बच्चा.. बातें कैसी  कर रहा है ?              मन में एक सँशय उभरता है कि,…  ऎन मेरे नाक तले इसका बचपन कौन मार रहा है, जी ? मेरे पूछने पर, वह हज़ारहाँ कसमें खा बैठते हैं, " यह मैंनें खुद सोचा है .. न मानिये तो, जो आपने वो वाली.. अरे वो नवनीत वाली बड़ी सी स्केचबुक दी थी, देख लीजिये मैंनें इन सबकी फॊटू भी आगे और है

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    • satish saxena: वाह भाई जी ! आनंद आ गया , इसे यहाँ मत चला देना सारा ब्लाग जगत ही बंद करा दोगे :-) बड़े दिन बाद आपको ...
    • विवेक रस्तोगी: लंतरानी अच्छी है, और ई रोबट को जनपथ पर बैठा दिया जाये तो मजा आये। :)...
    • डा. अमर कुमार: प्रवीण जी, आइन्दा ध्यान रखियेगा !
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    • यह, आप और....., पैचान कौन ?

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      बहुत शुक्रिया..बड़ी मेहरबानी.
    • दर दर की चिप्पियाँ

      Blogger Elite Plebian अमिताभ बच्चन अल-क़ायदा आत्मग्लानि इलाहाबादी उनकी टिप्पणियों पर उर्दू कभी कभी मेरे दिल में... काला कोट काहे-भाई-काहे-परेशान-है खींचाताना चिट्ठाचर्चा संदर्भ चिट्ठा्चर्चा सँदर्भ टाइमपास टिप्पणी दीन और दाढ़ी न जाने क्यों परिभाषित न हो सका नास्तिक चिंतक निट्ठल्लेखंडे पाकिस्तान पूर्णेंदु सम्मान बनर-खुज़ली बात बेबाक बुरबकई बेतक़ल्लुफ़ बेनज़ीर बेसिर- पैर की भात दाल मिनी पोस्ट मिलीजुली सरकार मूड मेरा लिखा मत पढ़ो मेरी पड़ोसन मोमिन योनिरह्स्यकम सँग साथी सँगी साथी संदर्भहीन व्याख्यायें सत्ता के संघर्ष सहपाठी होली ख़ुदा के लिये फ़ुरसतिया
    • …… और चिन्दियाँ

      आपबीती उर्दू किसकी ज़ुबाँ कभी कभी मेरे दिल में... कमज़ोर सरकारों पर तलाश साफ़ सुथरे दिमाग की निट्ठल्लाकारी पाकिस्तान तलक बुरबकई बेतक़ल्लुफ़ ब्लॅगिया का झस मिनी पोस्ट मेरी लँतरानियाँ मॉडरेशन मॉडरेशन हरकत-उल-अमेरिका होली
    • नवी ताज़ी दिलखुश टिप्पणी

      • निठल्ले का भी कोई परिचय on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • आँखों में भरे पानी का कौतुक on मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है
      • zeal on बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. ..
      • rakhshanda on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • rakhshanda on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • satish saxena on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • विवेक रस्तोगी on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • डा. अमर कुमार on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
      • डा. अमर कुमार on झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
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