अथ मनुष्य योनिः
Dec 2nd
आज तेरी याद आ रही है, विंध्याचल ।
हाईस्कूल में मेरे एक सहपाठी हुआ करते थे,विंध्याचल सिंह । महा के मुरहे और खखेड़ी जीव थे, यमदूत से भी पंगा ले लें, कोई ताज्जुब नहीं । अनजाने में ही उन्होंने एक जिज्ञासा मन में छोड़ दी, जो यदा-कदा सुलग उठती है । कोई खास नहीं किंतु निट्ठल्ले चिंतन में दिमाग की वर्जिस हो जाती है ।
हिंदी तृतीय प्रश्नपत्र की तैयारी चल रही थी, छप्पर में कक्षायें लगती थीं । हमारे हिंदी अध्यापक पंडित पूर्णेंद्र मिश्र बड़े मनोयोग से व्याख्यायें लिखवा रहे थे । झुके हुये 45-50 अदद सिर धड़ाधड़ अपनी कापियों पर नोट टांचे जा रहे थे । उनकी किंचित अटपटाती, गुलगुलाती आवाज़ गूंज रही थी, " मः ..नुष्य यो .. निः में .. बड़े भाग्य ..से जनः .. म होता है, जनम हो .. ता है । थूक सुड़कने की दीर्घ आवाज, तत्पश्चात आगे बढ़ने का वाक्य शायद मन ही मन बनाने लगे । इसकी नौबत ही नहीं आयी ।
पीछे से एक आवाज़ आयी, " गुरु जी !" आगे के लिखने में व्यस्त सिर पीछे मुड़ पड़े,देखा विंध्याचल सिंह खड़े हैं । आवाज़ उन्ही की थी, सदा की तरह कोई शरारती शंका लिये खड़े हैं, लेकिन उस दिन तो हद आगे और है
कभी कभी मेरे दिल में यह ख़्याल आता है
Nov 24th
यह बलम, सजन, सैंया वगैरह वगैरह किस ग्रह के प्राणी हैं ? बचपन में यह शब्द सहज लगते थे या कि मैं ही चुगद था कि ज़्यादा दिमाग लगाने से परहेज़ करता था,अरे होगा जैसा भाव मुझे दबोचे रहता था । ठूंस के खाओ और मस्त रहो । नर और नारी अलग अलग जीव होते हैं ,यह एहसास हुआ तो कुछेक वर्ष तो विस्मय में ही कट गये , समाधान करने वाला कोई विश्वस्त सुपात्र इर्द गिर्द मिलने में नहीं आ रहा था । फिर भी मादा का महत्व कुछ कुछ समझ में आने लगा था, पर विषद रूप से जानने की चाह निगाहें इधर उधर दौड़ाने पर मज़बूर करने लगी, छुप छुप के….छुप छुप के…चोरी हो चोरी …और कैसे ? अल्ला अल्लाह खै़रसल्ला्ह , इसी दौर में एक नयी नवेली चाची का आगमन परिवार में हुआ । मुझ निरीह पर विशेष बेबाक तरह की कृपा रहती थी, उनकी । चाची एक अदद रेडियो भी साथ लेकर आयी थीं ,9 के अंक में फंसे लाल बैटरी वाले सहबोला समेत, बात दीगर है कि कहलाता वह हमारा रेडियो था । इन सद्यब्याहता चाची का रेडियो प्रेम हम सब के लिये कौतुक का विषय था । हां तो, बज़रिये रेडियो बहुत सारे गाने सीधे सीलोन से उड़ते हुये आगे और है











