माडरेशन की प्रतीक्षा में
इस पहेली को हल करने के प्रयास में मुझे एक घटना याद आ गयी,
दो दोस्त आपस में उलझे हुये थे, शायद उन्हें कुछ लगी हुई थी ।
पहले ने कहा, " अगर मैं चाहूँ तो, तुम्हारे ऊपर पेशाब भी कर दूँ और तू भीगेगा भी नहीं !"
दूसरा उखड़ गया, " भला ऎसा कैसे हो सकता है ?"
हो सकता है.. नहीं हो सकता है कि तू तू मैं मैं चलने लगी, दस बीस तमाशबीन इकट्ठे हो गये ।
पहले ने कहा, " चाहे तो शर्त लगा ले ।"
दूसरा भड़क गया, " ऎसी अनहोनी पर शर्त क्यों लगा लूँ ?"
अब शर्त लगा ले.. और शर्त क्यों लगा लूँ.. की नोंक-झोंक चलने लगी ।
किसी ने सुझाया, अरे आज़मा ले भाई , शर्त लगाने में क्या जाता है ?
जो हारेगा , आख़िर उसी को पैसा भी तो भरना पड़ेगा कि नहीं ?
बीस रूपये की शर्त लग गयी । अगर तू पेशाब में भीग गया तो बीस रूपये तेरे, वरना तुम्हें बीस रूपये देने पड़ेंगे । चल ठीक है, चल ठीक है ! पहला उसे कोने में ले गया, और उसके ऊपर झर झर मूत दिया । दूसरा सिर से पाँव तक तर हो गया ।
पर, वह खुशी से चीख उठा, " देखो देखो, मैं तो पूरा भीग गया ! "
जनता ने देखा, सबने देखा, हर आते जाते ने देखा और उसके पक्ष में खड़ी हो गयी, " भई तू शर्त हार गया है, चल इसे बीस रूपये दे ।" पहले ने कहा, " मैं कब कह रहा हूँ कि, मैं जीत गया ? यह ले अपने बीस रूपये ! " उपस्थित भीड़ ने मज़ा लिया और चले गये अपने अपने रास्ते ।
उनकी यारी न टूटी, शाम को दोनों अपनी रोज की तलब ख़ारिज़ करने को इकट्ठे हुये ।
दूसरे ने पूछा, " यार यह बता कि तुमने यह कैसे सोच लिया कि तेरी हरकत से मैं नहीं भीगूँगा ।"
पहले ने शाँति से ज़वाब दिया, " मैं जानता था कि तुम क्या कोई भी भीग जायेगा ।"
दूसरा चौंका, " फिर ? "
पहले ने कहा, " यार यह बता कि तुमको ताव दिलाया और इतना मज़मा इकट्ठा हो गया, और तू भी सराबोर हो गया कि नहीं ? " दूसरा हँसा, " इससे तुम्हें क्या फायदा हुआ ।"
पहले ने कहा कि, " फायदा नुकसान मैं नहीं जानता ।
तू यह बता कि बीस रूपये में यह डील क्या बुरी रही ? " ![]()
मैं जानता हूँ, भाई कि इस पोस्ट से लम्बी यह टिप्पणी सार्थक नहीं है, और यहाँ माडरेशन भी लगा है । फिर भी, इस साझा मँच पर एक पाठक के नाते अपनी निरर्थक बात भी कहने का अधिकार तो है, ही !
अब इस पहेली का हल सोचता हूँ । उत्तर सही लगेगा, तो टिप्पणी बक्से का दुबारा उपयोग करूँगा ।
आपकी टैगलाइन " इस ब्लॉग पर लिखी बातों का मेरी विचारधारा से मेल खाना आवश्यक नहीं है,यहाँ लिखी बातें विभिन्न दृष्टिकोणों से सोचने का परिणाम हैं . अत: किसी प्रकार का पूर्वाग्रह न रखें ! " से बल मिला सो साहसपूर्ण यह टिप्पणी चेंप रहा हूँ ।
| प्रिंट करें | बेफ़ालतू: डा. अमर कुमार लिखेला है । September 6, 2009 किलॉक को, टैम होयला 7:06 AM, बेतक़ल्लुफ़, होली में ! तुमारे वास्ते RSS 2.0 - पोस्ट फ़ीड लिंक इधरिच मिलेंगा ।. अपने साइट से टिप्पणी दो..चाहे ट्रैकबैक जोड़ो ! । |
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लगभग 1 वर्ष पहले
लगता है आज इतवार है :)
लगभग 1 वर्ष पहले
अरे दागदार सहाब जी आज तो छुट्टी है, कल टिपईयएगे
लगभग 1 वर्ष पहले
डील बुरी नहीं, अपनी मर्दानगी का प्रदर्शन भी हो गया और दोस्त की बेशर्मी का भी:)
लगभग 1 वर्ष पहले
lajbaab
लगभग 1 वर्ष पहले
डील बुरी नहीं। टिप्पणी कर ही देते हैं! :-)
लगभग 1 वर्ष पहले
डील तो झक्कास रही :) इसी बहाने उ प्रहेलिका भी देखे आये.
लगभग 1 वर्ष पहले
बात बात में काम की बात कह गए गुरुवर…
लगभग 9 महीने पहले
ना समझे वो अनाड़ी है :)
लव´s last blog ..कुछ तो है: test …
लगभग 9 महीने पहले
ना समझे वो अनाड़ी है :)