बच्चा बच्चा… बूढ़ा बूढ़ा… हाल तुम्हारा जाने है
कितनी दुर्गन्ध फैल रही है ? क्या इतनी कि, बच्चा बच्चा नाक पर रूमाल रखने लगा है ? आज पर्यावरण दिवस पर यह एक रस्मी पोस्ट नहीं है, क्योंकि मेरे रिशि जी, ( इनसे आप यहाँ पहले मिल चुके हैं ) एक अलग तरह का सवाल पूछ बैठे । आज ही सुबह बगीचे में एक साँप निकला था, और मैंने उसे भाग जाने दिया । अभी भी वह यहीं है, किसी ठँडी जगह में.. । रिशि मुझे नसीहत दे रहे थे, कि आपने ’ उसे नहीं मारना ’ कह कर ठीक नहीं किया । मैं उनको धरती पर साँपों के होने का महत्व समझा रहा था, इनका भी जैविक पर्यावरण में एक अहम किरदार है । इतने में रिशि महाशय मौजिया पड़े फिर तो अपने लीडर्स इनसे ज़्यादा खतरनाक हैं, न अँकल ? मैं चौंकता हूँ, इतना सा बच्चा.. बातें कैसी कर रहा है ? मन में एक सँशय उभरता है कि,… ऎन मेरे नाक तले इसका बचपन कौन मार रहा है, जी ?
मेरे पूछने पर, वह हज़ारहाँ कसमें खा बैठते हैं, " यह मैंनें खुद सोचा है .. न मानिये तो, जो आपने वो वाली.. अरे वो नवनीत वाली बड़ी सी स्केचबुक दी थी, देख लीजिये मैंनें इन सबकी फॊटू भी बनायी है । "
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काटो काटो, जब झटका लगेगा.. तब न कहना
देखा आपने.. सहज विश्वास नहीं होता, न ?
मुझे भी यकीन न हुआ था कि, बच्चा बच्चा इनकी पदलोलुपता और निरँकुशता से इस कदर परिचित है ।
अब सो भी जाओ " पीछे से चिर-परिचित स्वर आता है । कँठ से लगा कि, शायद हमारी वो हैं ? इत्ती रतिया में, भला कौन ’ हो गई आधी रात ’ गुनगुनाने आयेगा, रे बुरबक ! वर्षों से बिना शर्त समर्थन देते आ रहे हो, अब इनके ही आगे शायद लगाते हो.. क्या वन्डरफ़ुल मेमोरी है, यार ? ( मेरा मन है कि, कम से कम धिक्कारता तो है ) शायद डेस्कटाप स्क्रीन से छन कर आती रोशनी ने ही इन्हें जगा दिया हो ? " अब सो भी जाओ, तुम भी क्या सब करते रहते हो.." उनींदी लहराती हुई आवाज़ टायलेट की ओर जा रही है । अच्छा अच्छा.. अच्छा अच्छा ! मैं भी रैली में चल रहे उकताये हुये भाड़े के टट्टू की तरह, बिना नारा सुने ज़िन्दाबाद लगा देता हूँ । का करें, इस बाड़े में जो रहना होगा, तो वन्दे बाबू-ईषिता मातरम कहना होगा ।
लौटते कदमों की आवाज़, नज़दीक आते आते मेरे पीछे आकर ठहर गयी । जब तक मैं अपनी बँधी गरदन मोड़ पाऊँ, एक सवाल दग जाता है, " रिशि ने खुद बनायी है… याऽऽ हः ( जम्हाई ) कि तुमने खुद ही तो डायरेक्शन देकर नहीं बनवायी ? " सनातन कालीन सतत शँकालु सहधर्मिणी है, यह !
कुछ कुछ समझ कर मैं,अपने चेहरे से खीझ के भाव को दुःख भाव में ढालने का प्रयास करता हुआ तमतमा गया, " क्या यार, आखिर तुम चैन से क्यों नहीं सोतीं ? मैं कोई मीडिया वाला हूँ कि, व्यूअर काउँट बढ़ाने को इस तरह की चीप स्टिंग मैन्यूपुलेशन करूँ ?
मैं ब्लागर हूँ.. ब्लागर ! सभी दबाव समझौतों से मुक्त ब्लागर
वह मेरे को कुछ ग्रेसमार्क दे देती हैं, " अच्छा अच्छा.. ठीक है.. तो अब सोने चलो.. ब्लागिया कहीं के "
सुना आपने.. .. हाय राम, इतनी इज़्ज़त बख़्शने के बाद भी, आज इन्होंनें मेरे सँग आपको भी इस माफ़िक बोला क्या ? इसका मतलब यह कि, बच्चा बच्चा.. बूढ़ा बूढ़ा… हाल आपका जाने है..
| प्रिंट करें | बेफ़ालतू: डा. अमर कुमार लिखेला है । June 5, 2009 किलॉक को, टैम होयला 9:37 PM, बेतक़ल्लुफ़, होली में ! तुमारे वास्ते RSS 2.0 - पोस्ट फ़ीड लिंक इधरिच मिलेंगा ।. अपने साइट से टिप्पणी दो..चाहे ट्रैकबैक जोड़ो ! । |
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लगभग 1 वर्ष पहले
ब्लॉगिया कहीं के अच्छा शब्द प्रयोग है ।
लगभग 1 वर्ष पहले
अरे वाह यए भेंण जी की बात लगे शे मन्ने तो मेरा मन है कि, कम से कम धिक्कारता तो है )यह बात बहुत अच्छी लगी,
गुड्गुड नाईट…:)
लगभग 1 वर्ष पहले
निखिल के फोटू बहुत प्रभावित करने वाले हैं ।
डा० अमर की ब्लॉगरी के लिये कह लीजिये – "बच्चा बच्चा.. बूढ़ा बूढ़ा… हाल आपका जाने है.."
लगभग 1 वर्ष पहले
कार्टून के साथ साथ "चुप ब्लागिया कहीं के" पसन्द आया।
सादर
श्यामल सुमन
09955373288
http://www.manoramsuman.blogspot.com
shyamalsuman@gmail.com
लगभग 1 वर्ष पहले
दुर्गंध फैले,सब हाल भले जान जाएँ, पर वो' तो डियो लगा के मस्त हैं।
लगभग 1 वर्ष पहले
उस सांप के बारे कुछ बताईये !
लगभग 1 वर्ष पहले
हुंह!! ब्लागिया कहीं के :-)
मुझे भी सांप में ही दिलचस्पी है.
लगभग 1 वर्ष पहले
कुछ मल्लिका शेरावत के बारे में बताइए. हमें उनमे दिलचस्पी है..
वैसे बच्चे अब बच्चे नहीं रहे.. शंकालु सहधर्मिणी वाली लाइन तो कमाल है.. बाकी आपको पढना तो धमाल ही है.. मीडिया वालो की बैठे बिठाये क्लास लेली आपने तो.. सही है गुरुवर चलाये रहिये.. और बच्चो को कभी कभार याद भी कर लीजिये..
लगभग 1 वर्ष पहले
मल्लिका के बारे हमें भी दिलचस्पी है .क्या पता उनका भी कुछ पर्यावरण से रिश्ता निकल आये …..
लगभग 1 वर्ष पहले
डा . साहेब ,
अब आप सठियाये हो या नहीं पता नहीं पर ब्लागिया जरूर गए हैं .अगर आप ये कहने के बाद भी की , ' बच्चा बच्चा बूढा बूढा हाल हमारा ….' तो आपकी अकल की बलिहारी . अरे बच्चे सबसे ज्यादा सच्चाई समझते हैं .
ऐसा न होता तो भगत सिंह की शहादत के बोझ तले ' ब्रिटिश साम्राज्यवाद चरमरा नहीं जाता . बच्चों ने ही तो तब भी समझा तो उनकी एक पीढी ने ही आजादी की लड़ाई लड़ डाली आजादी मिलने तक .
अगर आपकी तरह ' बापू ' ने भी सांप के लिए भी अहिंसा न बताया होता तो अंग्रेज पहले ही आजादी दे भाग गए होते .
अब आपको ब्लोगी होने ( बागी नहीं ) का प्रमाणपत्र मिल ही गया है तो हम क्या पोस्ट मार्टम करें ?
बच्चे ने समझ लिया तो उम्मीद जगती है .शायद देश के दुर्दिन जल्दी ही ख़त्म हों .
आमीन !
लगभग 1 वर्ष पहले
क्या लिखते हैं आप…भाई वाह..एक सांस में पढ़ गया…आपके लेखन का जवाब नहीं…तभी आपकी पोस्ट का इंतज़ार रहता है…निखिल जी को हमारी तरफ से बधाई दीजियेगा…कमाल का कार्टून बनाये हैं…हमें तो ये कल के आर.के.लक्ष्मण लगे…
नीरज
लगभग 1 वर्ष पहले
निखिल के कार्टून और 'सनातन कालीन सतत शँकालु सहधर्मिणी ' वाह !
लगभग 1 वर्ष पहले
"वन्दे बाबू-ईषिता मातरम " पे हम हुये लट्टु !
आहहा..क्य लिखते हो आप डाक्टर साब
और रिशि जी से भी मिल आये हम…
कुश की दिलचस्पी पे भी कुछ कहिये ना!