विरोध का यह तरीका, न जाने क्यों परिभाषित न हो सका
शहीद की अगली कड़ी देनी है । साथ ही अपना भी कुछ लिखने का मन बन रहा है, पर विरोध या अंतर्विरोध का कोई स्वर निकल ही नहीं पा रहा । क्या करें ? सा रे गा से उठाने पर मा पर जाकर टिक जा रहा है ! यहीं से एक मुरकी लगाकर मा पर ही बिलँबित होना ठीक रहेगा.. कहीं ज्यादा क्लासिकल न हो जाय ? मेरी पोस्ट सिर से ऊपर निकल जाने की शिकायतें वैसे भी अधिक आरही हैं । क्या करें ? ब्लागिंग छोड़ दें ? ख़ैर, जब छोड़ेंगे तब देखा जायेगा । आज तो कुछ लिखने की होती ही है, मँगल है.. वह भी बुढ़वा मँगल ! सुना है, ब्लागजगत में ’ बुढ़वा ’ की बहुत चलती है । सो, आज एक बार फिर ’ प्रयास करने ’ में क्या जाता है ? बुढ़वा अगर खुश हो गये, तो कोई भी माँगलिक अमाँगलिक अपशकुनी पोस्ट भी हिट ही समझो ! हिट हो.. या शिट, जब तलब लगी है, तो कौन रोक रहा है ? लिखना है तो लिख
आज पिटे हुये लालू को दौड़ाया जाय.. ? कुछ ही दिनों में उनकी पोस्ट-वैल्यू टके की तीन भी शायद ही रहे ? ना ना, निट्ठल्ले.. अपने कबीर को मत भूल.. ’निर्बल को न सताइये.. जाकी खोटी हाय !’ स्वदेशी रेल-प्रवर्तक थोड़े डिरेल हो गये.. तो इतने निष्ठुर भी ना बन जा ! तुम्हारे समोसे में ’आलू’ तो है ना, फिर तू लालू की चिन्ता में दुबला मत हो !
अब थोड़ा थोड़ा क्लू मिल रहा है.. ’दुबला मत हो’ पर कुछ चल तो रहा था, उसी पर लिख दिया जाय, काऽऽ हो ? वहाँ अमन हो गया होगा, तो भी इत्ते बड़े ब्लागजगत में कहीं न कहीं या फिर एक साथ कई जगह आग तो लगी ही होगी !
मौज़ की ढाल में तो अपना भी हाथ वाथ सेंका जा सकता है । ॑॑ ॒॒॒ ॑ य़ॆ॑॑ ॑ ईआ ख ॒॒॑॑॑॑ .. आज कीबोर्ड साथ क्यों न दे रहा है, भाई ? क्या यह दूर से मौज़ लेने की शरीफ़ाना प्रवृति की ओर इशारा कर रही है ? या यह स्वयँ से ही क्षुब्ध है ? या इसे कोई अँतरिक्ष से ही तो नहीं सँचालित कर रहा, कि विरोध ऎसे तरीकों पर इस तरह मौज़ लेने से कम से कम तुम तो बाज आओ ! लो भई, बाज आ जाते हैं ! कम्प्यूटर पर रह कर कीबोर्ड से बैर..भला कौन लेगा ? आज सबकुछ प्रतीकात्मक और अमूर्त ही रहे, तो क्या हर्ज़ है ? वैसे भी मेरी पोस्ट समझने और समझाने में नालायक साबित होती रही है ! चलिये बँद करता हूँ । अब ऎसी भी क्या नाराज़गी.. मेरा नमस्कार लेंगे भी, कि नहीं ?
| प्रिंट करें | बेफ़ालतू: डा. अमर कुमार लिखेला है । May 20, 2009 किलॉक को, टैम होयला 3:04 AM, बेतक़ल्लुफ़, होली में ! तुमारे वास्ते RSS 2.0 - पोस्ट फ़ीड लिंक इधरिच मिलेंगा ।. अपने साइट से टिप्पणी दो..चाहे ट्रैकबैक जोड़ो ! । |
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लगभग 1 वर्ष पहले
on blog vani the pasand is 4 but no kaments haalat “patli” haen sabki bina bijli kae
लगभग 1 वर्ष पहले
अब हम क्या कहें? आज सुबह से कोई फ़ीड ही नही मिल रही. पता नही हमारी ही परेशानी है या सबकी.
रामराम.
लगभग 1 वर्ष पहले
सोचता हूँ अपनी अदनी समझ को गलियाऊं कि इतनी देर रात गये पढ़ने की वजह को…कि पोस्ट समझ में नहीं आ रहा
लगभग 1 वर्ष पहले
बढिया है।
< HREF="http://alizakir.blogspot.com/" REL="nofollow">-Zakir Ali ‘Rajnish’<>
< HREF="http://tasliim.blogspot.com/" REL="nofollow">{ Secretary-TSALIIM <>< HREF="http://sciblogindia.blogspot.com/" REL="nofollow">& SBAI }<>
लगभग 1 वर्ष पहले
मौज़ की ढाल मे अपना भी हांथ सेंका जा सकता है ! :)
क्या उत्तम दर्शन बताया है डा . साहेब आपने . प्रैक्टिस करने की लैन मा हमहूं क अपने पीछयि खडा पव्ब्यो गुरु ! झाडे रह्यो उस्ताद , हम जैसे पिछलग्गवे भी हुंकार भरते पछुआय लेंगे .