यूँ तो अपन को किसी लफ़ड़े में पड़ने की आदत तो है, नहीं ? अब तक तक तो आप भी जान गये होंगे,कि, मैं अपना दामन बचा कर दूर से तमाशा देखने वाला एक आम शहरी आदमी हूँ । चाहें तो, मुझे शरीफ़ भी कह लीजिये, तो भी मैं बुरा न मानने का ! इसलिये मैं डा. अरविन्द के यहाँ से आते शोर से अपने को अलग ही रखे रहा । एक ब्लागर  दूसरे ब्लागर को  दे ही क्या सकता है, भला ? फ़क़त दो चार टिप्पणी या गाली गलौज़ तो आम बात है, ऎसे शैतानी पोस्ट पर  भी यदि साधु वाद आ जाय.. तो अपवाद ही मानो ! अपवाद यूँ कि, साहित्यिक गोष्ठियों जैसी नेटवर्किंग यहाँ उतनी परिपक्व न हो पायी है, या फिर कोई हिन्दी ब्लागर अपने सम्मान समारोह का आयोजन करवा कर उसमें पैसा लगाने जैसा ज़ोखिम अभी तो नहीं ही ले रहा है ! आगे की, ….?… जाने ( इंडिया सेक्यूलर या नान-सेक्यूलर, जब तक यह सुप्रीम कोर्ट तय करें.. तब तक यह स्थान रिक्त ही रहने दो ) ! एक ब्लागर की पहचान खतरे में है, चलो बड़ा अच्छा है.. यह गवारा न हुआSLL-torso

SLL-Lower

दूर की कौड़ी निहार रहे.. या अपने ब्लागरीय सँदर्भ तलाश रहे हों, भाई ज़ान ! हम्मैं क्या, हम शरीफ़ आदमी है, न बोलेंगे

 

किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.
शायद मैं अपनी बात रख पाया.

किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.
शायद मैं अपनी बात रख पाया.

किसी के अच्छे कार्य की सच्चे मन से सराहना करना और स्वार्थ सिद्धी के लिये चापलूसी करने के बीच एक बहुत बारीक लकीर होती है, लकीर के इसी तरफ सतता बरकरार रहती है और दूसरी तरफ क्षणिकता. उस पार तात्कालिक लाभ तो मिल सकता है मगर निरंतर लाभ इसी तरफ है.

इहाँ हमार कुछौ नाहीं, जौन जौन लिखा काटा अउर बेकाटा देखात है । उनपे चटका लगाओ, खुद जान जाओ । फोटू के ऊपर का हिस्सा कुछ और पढ़वाता है, नीचे का हिस्सा दीपक बाबू झटके लिये जा रहे हैं, चटका… चटका.. फढ़ो मत चटका लगाओ.. असल माल उधर है । " ऎई..  कोई काम नहीं है, क्या ? और फिर.. निट्ठल्ले पर बैठे हो ? "  अहाहा.. तभी तो मैं कहूँ, आज मेरी पँडिताइन कहाँ रह गयी ? वह आ जातीं तो यह पोस्ट समेट लेता ! भावावेश में यह पोस्ट स्टार्ट तो कर दिया था.. दि एन्ड कब और कैसे होगा ? यह तो खुद समीरलाल भी नहीं जानते ।  जिनको वक़्त की मार ने प्रेमी से उड़नतश्तरी बाना दिया । सिद्धै जबलपुर से सर्रर्रर्रर्र हो गये, ज़ानम समझा करो !
बड़ी बिफ़रैल नार है, भाई यह तो ? मेरी बोलती बन्द करने को बोलती हैं, " ज़ानम क्या ख़ाक समझें ? आप यह सब बन्द करिये, इस समय घर घर में सरकारें बनायी और गिराई जा रहीं हैं, लास्ट टू देज़ बचे हैं । आओ शगुन के लिये ही सही, हमलोग भी सीटें मिलि बाँटि लें । "

मैं उठ रहा हूँ, मित्रों । इस बँटवारे में निट्ठल्लादेश की परवाह ही कौन करता है । इस महापर्वनुमा लोकतंत्