मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ…
इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य से भी अधिक हिट होने की सँभावना रखता है ( चाहें तो आप अपनी प्रति सुरक्षित करवा लें )
साथ ही मैं मैं रवि छत्तीसगढ़ी रवि रतलामी भाई से अनुरोध करूँगा कि यदि वह मेरी हरकतों को अनदेखा न कर सकें, तो उसका समर्थन अवश्य करें । मेरे 19 वर्ष के लेखन अनुभव में इस प्रकार का लड़कपन ज़ायज़ है !
मैं आज की चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ ..
कारण निताँत व्यक्तिगत है, पर सार्वज़निक मँच का दुरुपयोग मेरा अधिकार है क्योंकि हम लोकतँत्र के चौथे खँभे हैं, और लोकमत की स्वतँत्र आवाज़ भी !
आदरणीय चर्चाकार स्पष्ट करें कि
1. उन्हें शीर्ष ब्लॉग्स को यहाँ लाने का अधिकार किसने दिया ?
2. आज की चर्चा में विवाद का एक्को बिन्दु न होना, कहाँ तक ज़ायज़ है ? प्रकाराँतर में आप हिन्दी ब्लॉगिंग को टाइमखोटी करने के अवसर से वँचित कर रहे हैं ।
3. जब कि हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है, सभी सँदर्भित ब्लॉग विदेशी भाषा के ही क्यों हैं ? हिन्दुस्तान के अँदर-बाहर बैठे ब्लॉगर द्वारा हिन्दी को ग्लोबल बनाने के सपने को यह चर्चा अपमानित कर रही है !
4 .हम हिन्दी ब्लॉगिंग की ऊँचाईयों को अभी टँकी से ऊपर नहीं ले जा सके हैं, उस स्थिति में यह चर्चा कितनी प्रासँगिक है.. यह स्पष्ट करें ।
5. अपने अपने ब्लॉगकर्म में लिप्त अधिकाँश ब्लॉगर सरवाइकल-स्पॉन्डिलाइटिस से पीड़ित है,वह अपनी गरदन-खिंचाई की कीमत पर टाँगखिंचाई करते हैं.. ऎसे में उन्हें शीर्ष दिखलाने का औचित्य डॉक्टरी सलाह के प्रतिकूल बैठता है और इस प्रकार का कोई आईना दिखलाने की बाबत मैं आपको क्यों न नोटिस जारी करवाऊँ ?
6. यदि मुझ स्वयँ को ही ऍक्रोफोबिया ( Acrophobia ) है, तो यह क्यों न माना जाये कि पूरे ब्लॉगजगत को इसमें धकेलने का यह आपका ज़बरिया प्रयास है ?
7 .इस दौर में जबकि ब्लॉगिंग की सार्थकता के नाम पर कुछ विद्वान एगैटोफोबिया ( Agateophobia ) के शिकार होते जा रहे हैं, यह चर्चा समय से पहले है !
चूँकि मैं आपका सम्मान करता दिखूँ , इसलिये ….
नोट :
1. चिट्ठा चर्चा हिन्दी चिट्ठामंडल का अपना मंच है। कृपया अपनी प्रतिक्रिया देते समय इसका मान रखें।
2.यदि यह टिप्पणी चर्चा के मूल विषय से हट कर है, तो कौन यहाँ मूल विषय पर टिप्पणी करने आता ही है ?
3.@ सँगीता पुरी : कृपया अपने को सँशोधित करें
" लेखकों से अधिक पाठकों की आवश्यकता है "… ( मेरे अनुसार कम से कम हम्मैं तो ) पाठकों से अधिक पहलवानों की आवश्यकता है !
| प्रिंट करें | बेफ़ालतू: डा. अमर कुमार लिखेला है । March 7, 2010 किलॉक को, टैम होयला 1:05 PM, बेतक़ल्लुफ़ में ! तुमारे वास्ते RSS 2.0 - पोस्ट फ़ीड लिंक इधरिच मिलेंगा ।. अपने साइट से टिप्पणी दो..चाहे ट्रैकबैक जोड़ो ! । |
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टिप्पणियों पर कोई बंदिश नहीं ! पहचान के मोहताज़ गुमनाम बुज़दिल दूरी बनायें रखें, बैन विकल्प सक्षम है !
असभ्य भाषा, आक्षेप-केन्द्रित एवँ अशोभनीय टिप्पणियाँ कदापि न हटायी जायेंगी, यह ध्यान रखिये कि,
आपका लिखा ही आपका परिचय है, प्रमाण स्वरूप आपके लिखे शब्द यहाँ शाश्वत रहेंगे !






















लगभग 6 महीने पहले
बहुत खूब! बहुत खूब!!
सस्नेह — शास्त्री
हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है
http://www.Sarathi.info
लगभग 6 महीने पहले
वैसे तो यहाँ बहुत सारी कारग़ुज़ारियाँ हैं ।
बहुत खूब ! बहुत खूब क्या ?
लगभग 6 महीने पहले
नीचे…………………………………
लगभग 6 महीने पहले
—sahee chintan–aabhar-
लगभग 6 महीने पहले
–सही चिंतन—आभार-
लगभग 6 महीने पहले
mast
लगभग 6 महीने पहले
पहलवान ढूंढ रही हूं !!
लगभग 6 महीने पहले
सँदर्भ : टिप्पणी सँख्या 8
श्री अनूप जी से सम्पर्क करें !
लगभग 6 महीने पहले
आप अपनी मांग सही से बताइये।कौन टाइप के पहलवाल चाहिये? लौटती डाक से स्पेशीफ़िकेशन पठाइये। हर तरह का आइटम मिल जायेगा। फ़ुरसतिया/फ़ोकटिया/ठेलुहा पहलवान से लेकर बुद्धिजीवी पहलवान तक। आपको नारीवादी पहलवान चाहिये या लफ़ंगा टाइप का? साधुवादी चाहिये या हलचलिया सब मिलेगा। आप बताइये तो सही!
लगभग 6 महीने पहले
तो.. पहलवानों के सप्लायर आप निकले, अनूप भाई !
तब तो बड़ा अच्छा है.. रेट कोटेसन कैटॅलाग सहित अपनी निविदा अविल्म्ब भेजें । कहीं आप समीर भाई को रोजगार के एक अवसर से वँचित तो नहीं कर रहे ?
वह तो फिछले ढाई घँटे से दँड-बैठक लगाना आरँभ भी कर चुके हैं ।
लगभग 6 महीने पहले
जै! जै!
लगभग 6 महीने पहले
हमारी कॉपी अभी से बुक कर दीजिए। …।:)
लगभग 6 महीने पहले
दंड बैठक लगाना शुरु कर दिये हैं..शायद आपे के द्वारे नौकरी लग जाये.
लगभग 6 महीने पहले
मिथिलेश भाई से प्रेरित लगती है यह पोस्ट,,,,
आश्चर्य है कि बड़े-बड़े विद्वान लोग भी एक छोकरे के पीछे पड़े हैं…
लगभग 6 महीने पहले
हेलॅ-हिटलर..
कृपया प्रिय मिथिलेश को छोकरा न कहें,
यह अशोभनीय प्रतीत होता है, उसमें मौलिक विचारों का भँडार और असीमित ऊर्ज़ा है । इस पोस्ट को दुर्भावना रहित मन से पुनः बाँचें ।
मुझमें चर्चिल जैसी वाक्पटुता नहीं, कदाचित इसी कारण आपको ऎसा लगा हो !
और.. मुझ अकिंचन को विद्वान होने का भ्रम तो कभी से भी नहीं रहा,
आपने यदि ऎसा सोचा तो मुझे इसकी तसदीक़ करवानी पड़ेगी !
मिथिलेश लम्बी रेस का किरदार है, उसे अपने बीच पाकर हर्ष के अलावा कुछ और भी हो सकता है, यह आपसे आज ही जाना ।
आग़ाह करने का धन्यवाद !
लगभग 6 महीने पहले
मैं आपके पुरजोर विरोध का धुँआधार समर्थन करता हूँ:)
लगभग 6 महीने पहले
हिटलर जी कभी आईये हमारे गली तो हम दिखायेंगे कि किस तरह हम जिया करते हैं , और कैसा है छोकरा ये भी बखूबी एहसास हो जायेगा , विश्वास करियेगा आप निराश होकर नहीं जायेंगे ।
@अनूप शुक्ल जी
भईया हमने तो सुना था कि हिन्दी ब्लोगिंग में एक ही पहलवान हैं वह भी महफूज भाई लेकिन आप तो कुछ और लोगो का नाम गिना रहे है आपको बता दूं यहाँ उस टाईप के लोगो की गिनती नहीं होती
लगभग 6 महीने पहले
लगभग 6 महीने पहले
आप जब तक ‘उपर’ नहीं चले जाएंगे, तबतक चर्चा का पुरजोर विरोध करते रहेंगे…आपको आइडेंटिटी क्राइसिस है न!
लगभग 6 महीने पहले
बिल्कुल सही कह रहे हो, दोस्त..
इस पोस्ट में अँतर्निहित यही मुद्दा था, कि यह विवाद, बखेड़ा, विरोध इत्यादि बेमानी मुद्दे ’ अपनी पहचान ’ साबित करने का एक भोंड़ा शॉर्ट-कट है.. .. बल्कि इससे अधिक कुछ और है ही नहीं ?
आरोप – प्रत्यारोपों के मध्य जो तमाशबीन आ जुटते हैं, वह भी प्रत्यक्ष या परोक्ष रूप से इससे अपने को जोड़ लेते हैं.. रातों रात सुर्ख़ियों मे आने और टी.आर.पी. पाने का आसान शॉर्टकट हुआ कि नहीं ?
धन्यवाद
लगभग 6 महीने पहले
हैट्स ऑफ टू यू. मगर, जड़ बुद्धियों को कौनो समझ आएगा? शायद नहीं. कभी और, कदापि नहीं. उल्टे वे कुतर्कों का घड़ा लेकर आपके सामने फोड़ने चले आएंगे हर बार, और ज्यादा बोल्ड, दमदार और चीखपुकार समेत.
रहा सवाल टिप्पणी मॉडरेशन का, तो हर सेंसिबल चिट्ठाकार को यह लगाना ही चाहिए. कौन जाने किस दिन कोई किसी अन्य की ऐसी तैसी तब कर दे जब आप घोड़े बेच कर सो रहे हों, और जब तक आपको कोई जबरन उठाकर ये न बताए कि भइए, उस खतरनाक टिप्पणी पे डिलीट मारो, तब तक तो नुकसान बहुत हो चुका होगा.
काहे कि हम व हमारे बहुत से पाठक भी बहुत सारे वायग्रा इत्यादि विज्ञापनों व वायरस कड़ियों से ऐसे नुकसान झेल चुके हैं, इसलिए अपना अनुभव बता रहे हैं! और कुछ अनामी जन तो इससे भी बड़े खतरनाक होते हैं!!! अब आप मानें, न मानें आपकी मर्जी!
और हाँ, इनके सामने कौनो कैप्चा भी काम नहीं करेगा.