ग़र होश जरा सा अब तक है फ़ाग़ी.. होश तू अपना तौल !
लगा कि ये साल वी सुक्खा-सुखियाँ ही निकल जाने को है, पर वह न हुआ । अपना आज कुछ ऎसा डौल लग गया कि, लगदा है आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा ।
ऒऎ कोई नहीं, वो तो जैसे ही सन्दीप ने एक ठोका, यो लाग्या कि अब आगया मौका. लेकिन जैसे ही भाई परभजोत ने तीसरा ठोका, दिल इस कदर बल्ले बल्ले होया, कि इक माहौल बन गया.. ना जी, ये तो सेलेब्रेट का मामला है, मौका और माहौल दोनों आन मिले उम्मीद थी कि गला-वला तर करने को आज गृह मँत्रालय से अँतरिम राहत मिल जायेगी । पर सनम जी ?
वह तो झू्ठियों की सरदार निकलीं । चहक कर उचकीं, ऒऎ क्या बात है, " चक दे इँडिया !" और पलट कर मेरी चहक को छील कर धर दिहिन, बड़ी चालाकी से चर्राती भयीं, ऒऎ ज़िन्दगी का मज़ा एक बार होश में लेकर भी देख.. ज़रूरी है कि खुशी के इज़हार में हमेशा बेहोश होकर ही लोटेगा ? अच्छा चलो परमिशन दिया.. लेकिन तुम्हारा मद्यप्राशन कौन करायेगा, जरा हम भी तो देखें ? ( इसके जिम्मेदार आप हो समीर भाई, विन्टेज़ की एक बोतलिया बेचारी तुमसे सीलभँग करवाने को अहिल्या बनी एक बरिस से तैयार बईठी है, अपने इंडिया आने की पिछली खेप में, इसको मेरे सँग बहला कर फूट लिये..इस बार ज़रूर आ जाना..। )
यह हाल है इन हृदयघातिनी का.. प्यार के व्यापार को दिल का एक कोना माँगा, बाद में ईस्ट-इंडिया की तरह पूरा कब्ज़ा करके कँपनी बहादुर बन बैठी हैं । हम उनके लाड़ में ज़ाहिल और अधिकार में ग़ुलाम घोषित हो चुकें हैं और होता यही है कि अपना कोई भी फ़ैसला तामील होने से पहले उनका स्थगनादेश आ जाता है । अब हर कोई आपकी तरह अपनी बीबी से जिरह तो कर नहीं सकता… लेकिन मैं तो उनको मुँह हीं नही लगाता । खून के चँद कतरों से गला तर करने के बाद हम श्री आदि-तरँग शिवमणि बूटी जी के शरणागत होते भये ।
तो.. आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा ।
सुस्ताने के नाम पर अपनी माँद में ऎंवेंईं घुसे रहने की लिमिट पार हो गयी है, वैसे इस जँगल में मेरी दहाड़ की गूँज कभी कभी सुनी तो होगी, ना जी ? तो ठीक, यह न समझना कि मैं दहशत खा गया, जबसे हमारे लोगों की गिनती शुरु हुई । वैसे हमारी गिनती जैसे ही 1409 तक पहुँची, हम सटक लिये..सोचा, " बेटा अगर तुम भी गिन लिये जाओगे, तो मारने वाले तुम्हारी ढूँढ़ में जँगल पहाड़ एक कर देंगे ।" हैं जी, जब उनको पहले से पता होवेगा कि 1412 की गिनती हो चुकी है, तो वह भला 1411 पर क्यों रुक जाँगें ? हैं जी, मैं गॅल्त तो नहीं कह रिया ? सोचने वाली बात तो यह है कि जितनी हमारी गिनती घटेगी, उतनी वर्ल्ड वाइल्ड लाइफ़ फ़ँड, यूनिसेफ़, वर्ल्ड बैंक वगैरा से पैसा आवेगा । देश में विदेश से पैसा आवेगा तो खुशहाली बढ़ेगी.. खुशहाली बढ़ेगी तो हमको आपको भी एक दिन खुशहाल होने से कोई न रोक पावेगा, हैं जी ।
हो जाँगे, भई हो जाँगे.. मेरे को इत्ती भी ना चढ़ी कि आपको खुशहाल भी न कर पाऊँ, हैं जी ? सबर करो, यह तो बढ़ते बढ़ते बढ़ने वाली चीज है, जी ! ऊपर से नीचे के चक्कर वाली चीज है, खुशहाली.. पानी को नीचे ऊपर बहते देखा है कब्भी, हैं जी ? अगर पैसा बहता है, तो बहने वाली चीज ऊप्पर से नीचे को बहेगी न जी ? आगे आपके दरवज़्ज़े के सामने से ना बहे, तो कहना । आख़िर आप देखो कि न्यूटन के सेब को भी एक दिन नीचे गिरना ही पड़ा कि नहीं ? मैं गॅल्त तो नहीं कह रिया, जी ? आप तो बड़ी लवली टाइप मुस्की मार रियो है ? मैं गॅल्त नहीं कैह रिया..
ना मेरे को चढ़ी ही है । ना तो यह कोई होली पोस्ट है, अपनी होली तो हो ली, जी ! मैं भला वह क्यों लिखूँगा जिस पर सभी जुटे पड़े, मै तो इक बात कैह रिया कि भई खुशहाली आण आली है.. रस्ते में है । आप तैयार होलो जी ।
होलो जी… होलो जी ? अच्छा भई हिमाँशु, जरा गिरिजेश से पूछ कर यह बताओ कि होली इस्तरी-लिंग है कि पुल-लिंग ? जे इसमें इस्तरी वाली बात होवे, तो हम होलो मनावेंगे । क्या पता ये लुगाईयाँ कभी इस पर भी इस्तरी ना फेर दें ? क्या कर लोगे, जब कोई स्त्री दावा करेगी कि इस्तरी-लिंग वाली होली को मर्दों ने हथिया लिया ? मरदों के लिये होला है, जो उनने फूँकने वास्ते रख छोड़ा था । मैं गॅल्त तो नहीं कह रिया जी ?
ना जी.. ना, च्च च्च मेरे को ना चढ़ी है, आप अपनी जानो । मैं तो चढ़ा हुआ ही पैदा हुआ, अब भी जहाँ मौका मिला चढ़ लेता हूँ.. गोया नाइन्टी प्रति सैकड़ा टाइम मैं किसी न किसी पर चढ़ा हुआ मिलता हूँ । तभी मेरे सभी दोस्ट.. दोश्त, दोस्त मुझे चढ्ढा-चढ्ढा कहवें हैं, अब सोचने वाली बात यही ठहरी कि, मेरे को ऎसे में क्या चढ़नी, जी ? मेरी इत्ती सारी फिसली.. फिछली, दुत्त पिछली, हाँ पिछली पोस्ट पढ़ने के बाद, जो हमेशा धरम-ईमान से अपने को बहकी हुई साबित करती आयीं हैं, मेरे को अपनी यह सफाई देनी पड़े, तो समझ लो कि आपको चढ़ी है ।
मैं गॅल्त तो नहीं कैह रिया… है ना जी ?

इनमें से एक आपकी बड़ी मुरीद हैं, कहती थीं," पूरे ब्लॉगजगत में एक होशमँद और सधे हुये ब्लॉगर आप ही हो ।" मैं गॅल्त नहीं कैह रिया… ना तो मेरे को चढ़ी थी… ये तो वैसे भी वह आपकी बहुत तारीफ़ कर रहीं थीं । हाँ जी, कल एक ब्लागकारा से मुलाकात हुई, मैं एक बारगी पहचान ही न पाया.. उन्होंनें जब आपका सँदर्भ दिया तब भरोसा हुआ.. मेरी नज़र में इनमें से एक उभरती हुई धाकड़ ब्लॉगर हैं… जरा पहचानिये कि आपकी नज़र में इनमें भला वह कौन है ? यदि पहचान लिया तो कद्दू में कोई ऎसा तीर न मार लोगे कि.. हम एक प्रशस्तपत्र दें… जो आप उस पर अपना टूल-टिप तक न टिका पाये तो समझ लो कि आपको ही शर्तिया अभी भी चढ़ी है ।
| प्रिंट करें | बेफ़ालतू: डा. अमर कुमार लिखेला है । March 2, 2010 किलॉक को, टैम होयला 4:38 AM, बेतक़ल्लुफ़, होली में ! तुमारे वास्ते RSS 2.0 - पोस्ट फ़ीड लिंक इधरिच मिलेंगा ।. अपने साइट से टिप्पणी दो..चाहे ट्रैकबैक जोड़ो ! । |
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लगभग 6 महीने पहले
डॉक्टर साहब
हमने तो देशी विन्टेज से ही काम चला लिया-
महुआ पहली धार का और छोरा जमना पार का
आपके पास होते तो गुलाल भी लगाते-आशी्ष भी लेते
यो समझो लगा दिया-आभासी गुलाल
आपने होली की घणी घणी राम-राम
लगभग 6 महीने पहले
बोलो राधे राधे,
जय सियाराम शर्मा जी,
अजी आपको अशीष की क्या ज़रूरत ?
आप तो बख़्शीश के हक़दार हो, सुना चर्चाकारों में भर्ती ले ली ?
मैं तो यही लिख सकूँ कि आप घूम गये, अच्छा लगा, दया बनाये रखियेगा !
घणी राम राम !
:)
लगभग 6 महीने पहले
चक दे इण्डिया तो हो ही गया..
वैसे पता चला कि नहीं कि होली स्त्रीलिंग है या पुर्लिंग..?
और ये जो फोटोस जो आपने लगा रखी है.. इसकी इंस्पिरेशन कहाँ से मिली.. निठ्ठले से ये सवाल सारे आम पुछा जाता है..
लगभग 6 महीने पहले
व्हाट इँस्पिरेशन… व्हाट आइडिया ?
श्रीमान जी,
कल आपसे गले मिलते समय एक मोबाइल आपकी ज़ेब में मिला था । मैंने रख लिया, आइन्दा होश रखा करिये ।
सभी 86 फोटोज़ उसी मोबाइल में बरामद हुये,
जो कुछ हद तक दिखाने लायक था, वह लगा दिया ।
बाकी के 84 फोटोज़… राम ही राख्यै…
कोई भला आदमी इस तरह भी कर सकता है क्या ?
खैर निश्चिन्त रहो.. मैंनें अपने कम्प्यूटर में सहेज़ लिया है ।
वक़्त-ज़रूरत मेरे काम आ सकता है !
लगभग 6 महीने पहले
डॉक्टर साहब,
ये तो राजस्थान की केसर कस्तूरी और गोवा की फेनी से भी ज़्यादा ताबड़तोड़ है…वो तो सिर्फ सिर से चढ़ती हैं, ये तो
न जाने कहां कहां से चढ़ रही है…
समीर संतरीमंडल की सूची को आपका अनुमोदन नहीं मिला, इसलिए प्रधानसंतरी समीर लाल समीर जी और सभी संतरीगणों का पदभार संभालने का कार्यक्रम अगली होली तक टाल दिया गया है….तब तक फैसला ज़रूर ले लीजिएगा…
जय हिंद…
लगभग 6 महीने पहले
मुझे सिक्किम में मिली स्थानीय छाँग से बेहतर कुछ ना लगा ।
वैसे अभी कोई मिलने आया है, तुमसे बाद में डिटेल बात करेंगे ।
बेहतर होगा, तुम स्वयँ ही बतला दो कि कल शाम किसके घर पड़े थे ?
ठीक है तुम उधर समीरसँतरी मँडल में सेंध लगाओ । मैं इधर फ़ुरसतिया गुरु के मौज़मँडल में फ़िट हूँ , समीर भाई का सँयम-डिसिप्लिन हम्मैं न हज़म होगा ।