डा. अमर कुमार
बड़े तप और प्रयास से यह परमगति प्राप्त हो पाती है । भागते खसोटते बुद्धिमानों को जब अपनी ही बुद्धि से बिलबिलाते हुआ देखता हूँ, तो अपने जड़त्व पर माथा ऊँचा हो उठता है । ऎसा निट्ठल्लत्व सबको कहाँ नसीब ? कुछ घँटे की बेखौफ़ बेलौस निट्ठल्लई में ’ नावक के तीर ’ चलाने का जो मज़ा है, वह तने हुये टेंटुओं पर टाई लगाने वाले क्या जानें ? यह है सदा ज़वाँदिल बने रहने की गारँटी ! स्वयँ ही खूँटा गाड़ा और अपने पगहे को रोते हो... होवेंगे कोई डा. अमर कुमार... जो इधर डाक्टरी का खूँटाइच उखाड़ कर बिन्दास कुलाँच मारेला ऎ ! पकड़ लो मुझे, समझो बेड़ापार
Posts by डा. अमर कुमार
झूठ पकड़ने वाला रोबॉट
Jul 3rd
जब मैं छोटा बच्चा था, कभी शरारत नहीं करता था.. ढँग की जब कोई बात सुने ना, फिर मैं दँगा करता था आज मेरा मन निट्ठल्ला डीप-रेस्ट है, मैंनें दू-दुगो पोस्ट लिक्खड्डाली.. और एक सब्सक्राइबर तक झाँकने न आया । ऍग्रीगेटर के टोट्टे में सब अपनी अपनी टिप्पणी गिनने में व्यस्त हैं… इधर अपने को दँगा करने का मन हो रैया है । टूँऊँउ ऊँ, जिन्हें नाज़ था बेलागिंग की बुलन्दियों पर.. कहाँ है, कहाँ है, कोहाँयऽ हँयऽऽऽ.. कोहाँय हँय टूँऊँउ ऊँ, ऊँउँ.. वो मठाधीशों की धौंसें, वो एसोशियन के वादे.. कहाँ है, कहाँ है, कोहाँयऽ हँयऽऽऽ.. कोहाँय हँय कहाँ है वह गाली, कहाँ वो गुफ़्ते.. वो बेनामियों के झटके, वो नापसँदियों के चटके.. कहाँ है, कहाँ है, कोहाँयऽ हँयऽऽऽ.. कोहाँय हँय,कहाँ है, कहाँ हैंऽऽऽ सच है यारों, ब्लॉगिंग में शायद दँगाईयों की ही ज़्यादा सुनी जाती है । हम भी अभी दँगा करने का मूड बनाय के आय थे, पर इन सूनी गलियों में दँगा करने का भी भला कोई मज़ा है ? फिर यह भी सुना है कि, दँगा करने वास्ते माइकल को दारू पीना पड़ता है.. अपुन तो बिन्दास माइकल बनने सकता, पण दारू किधर से लायेंगा, मैन ? घर में दारू की बचेली-खुचेली एक बूँद-इच नहीं ! दारू आगे और है
बेशक पोस्ट टिप्पणीऽऽ ठेलो.. ..
Jun 7th
बेशक पोस्ट टिप्पणी ठेलोऽऽऽऽ.. निट्ठल्ला ये कैताऽ
पर ऎसी टुँगी कभी न छोड़ो, जिससे दिल दुखे व भगदड़ मचता
हालिया घटनाक्रम से तो यही लग रहा है कि “चलो रसातल ओर हो ब्लॉगर .. चलो रसातल ओर“ भविष्य का हमारा ब्लॉगगीत बन जायेगा ! फोटो ऎडिटिंग टूल्स के साथ यह निट्ठल्लाकारी खींच-तान उन्हीं अनमने क्षणों की देन है । कभी “एकला चोलो रे“ से ब्लॉगिंग आरँभ किया था लोग जुड़ते गये, हौसला बढ़ता गया । लगता है कि मैं खुद बखुद अपने कारवाँ से बिछड़ता जा रहा हूँ । स्वयँ से प्रश्न करें, आप यहाँ क्यों मौज़ूद हैं ? इति शुभम
“… .. ….. .. … .. ? ”
May 6th
इस पोस्ट के कई शीर्षक दिमाग में घूम रहे थे, टिप्पणी मॉडरेशन से अपना कद कैसे बढ़ाये । कुशल टिप्पणी प्रबँधन से ब्लागरीय सौहाद्र कैसे कायम करें विषयपरक टिप्पणियाँ बहुमूल्य है, इसे बरबाद होने से रोकें स्पैम की आड़ में टिप्पणियाँ और बड़का ब्लागर, मुझे तो कोई जमा नहीं.. आप अपनी सुविधानुसार इनमें कोई एक चुन लें । यदि सभी चुन लेंगे तो भी मेरा क्या ले जायेंगे ?
नॉऊ प्रोसीड टू पोस्ट ! लगता है, आज भी इस नाज़ुक मौके पर पोस्ट न लिख पाऊँगा । चिरकालीन विघ्नसँतोषी जीव पँडिताइन का प्रवेश.. वह विश्वामित्र की मेनका न सही, पर अभी तलक कुछ ख़ास हैं । सो, अपने असँयमित होने को सिकोड़ उन्हें तवज़्ज़ों देनी ही पड़ी..
आज का अख़बार देखा ? नहीं, नेट खोल कर निट्ठला बैठा हुआ हिन्दी के कल्याणकारी फ़ैक्टर्स को प्रोत्साहित करने की सोच रहा हूँ । आख़िर तुम्हारी जागरुकता कहाँ चली गयी ? देश में 140 आतँकी घुस आये हैं, सुरक्षा को लेकर चिन्ता.. और तुम ? हुँह, जाओ यार बोर मत करो.. यह तो रोज के चोंचलें हैं । एक कप चाय बना दो.. ब्लैक बनाना, फिर शायद कुछ अच्छा सोच पाऊँगा ।
अच्छा सुनों, जब 140 देश में घुस आये हैं.. तो ब्लॉगिंग में भी 20-30 घुसे आगे और है
आज कंमेंटियाने की ज़िद ना करो…
Apr 26th
इतने दिनों की ग़ैरहाज़िरी की भरपायी करने की ठान रखी थी, सोचा कि आज दो नये पोस्ट अवश्य दूँगा । मेरे सँकल्प को जब नींद टँगड़ी मारने लगी तो, सोने से पहले अम्मा को हिदायद दी कि, एक ज़रूरी काम है.. सो मुझे तीन बजे जगा दीजियेगा । घर में बूढ़े-बुज़ुर्ग होने का यह एक फायदा तो है ही कि, उनसे ऍलार्म का काम बखूबी लिया जा सकता है । फिर यह तो ठहरीं, ढीले स्प्रिंग की बिगड़ी हुई घड़ी ! अल्ल्सुबह पौने तीन बजे ही इन्होंनें टुन्नु टुन्नु की ऎसी रट लगायी कि उठना ही पड़ा… दिल लगाया ब्लॉगिंग से तो चैन क्या चीज़ है .. पहले तो अज़ीब आदमी से दो-चार होने का फैसला लिया, बेचारा वेबलॉग उपेक्षित पड़ा है । इस अज़ीब आदमी ने ऎसा उलझा लिया कि उड़नतश्तरी फ़ेम समीर भाई समीर की दिखावे की दुनिया तक दिख गयी, और मैं टिपिर टिपिर करता टापता ही रह गया ! लाला की ज़ुबान.. और चाणक्य की खुरपी, अगर भोथरी हो जाये तो दुनिया का माठा निकल जायेगा ( मुहावरों पर शोधरत अनूप शुक्ल क्या इस पर प्रकाश डालेंगे ? यह बस एक आग्रह ही है, इससे अधिक कुछ और अपनी जिम्मेवारी पर समझें )… तो साहब मेरा दूसरा पोस्ट रहा जा रहा आगे और है
मैं चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ…
Mar 7th
इधर मॉडरेशन बनाम डिस-ऍप्रूवल के खतरें इतने बढ़ते जा रहे हैं कि, मुझे अपनी टिप्पणियों का एक डुप्लीकेट सहेज रख छोड़ना होता है । यह मेरा मौलिक प्रयास है, और कालाँतर में यह आपात्काल के बाद आये हुये साहित्य से भी अधिक हिट होने की सँभावना रखता है ( चाहें तो आप अपनी प्रति सुरक्षित करवा लें )
साथ ही मैं मैं रवि छत्तीसगढ़ी रवि रतलामी भाई से अनुरोध करूँगा कि यदि वह मेरी हरकतों को अनदेखा न कर सकें, तो उसका समर्थन अवश्य करें । मेरे 19 वर्ष के लेखन अनुभव में इस प्रकार का लड़कपन ज़ायज़ है !
मैं आज की चर्चा का पुरज़ोर विरोध करता हूँ .. कारण निताँत व्यक्तिगत है, पर सार्वज़निक मँच का दुरुपयोग मेरा अधिकार है क्योंकि हम लोकतँत्र के चौथे खँभे हैं, और लोकमत की स्वतँत्र आवाज़ भी ! आदरणीय चर्चाकार स्पष्ट करें कि 1. उन्हें शीर्ष ब्लॉग्स को यहाँ लाने का अधिकार किसने दिया ? 2. आज की चर्चा में विवाद का एक्को बिन्दु न होना, कहाँ तक ज़ायज़ है ? प्रकाराँतर में आप हिन्दी ब्लॉगिंग को टाइमखोटी करने के अवसर से वँचित कर रहे हैं । 3. जब कि हिन्दी ही हिन्दुस्तान को एक सूत्र में पिरो सकती है, सभी सँदर्भित ब्लॉग विदेशी भाषा के ही आगे और है
ग़र होश जरा सा अब तक है फ़ाग़ी.. होश तू अपना तौल !
Mar 2nd
लगा कि ये साल वी सुक्खा-सुखियाँ ही निकल जाने को है, पर वह न हुआ । अपना आज कुछ ऎसा डौल लग गया कि, लगदा है आज सब बेडौल ही लिक्खा जावेगा ।
ऒऎ कोई नहीं, वो तो जैसे ही सन्दीप ने एक ठोका, यो लाग्या कि अब आगया मौका. लेकिन जैसे ही भाई परभजोत ने तीसरा ठोका, दिल इस कदर बल्ले बल्ले होया, कि इक माहौल बन गया.. ना जी, ये तो सेलेब्रेट का मामला है, मौका और माहौल दोनों आन मिले उम्मीद थी कि गला-वला तर करने को आज गृह मँत्रालय से अँतरिम राहत मिल जायेगी । पर सनम जी ?
वह तो झू्ठियों की सरदार निकलीं । चहक कर उचकीं, ऒऎ क्या बात है, " चक दे इँडिया !" और पलट कर मेरी चहक को छील कर धर दिहिन, बड़ी चालाकी से चर्राती भयीं, ऒऎ ज़िन्दगी का मज़ा एक बार होश में लेकर भी देख.. ज़रूरी है कि खुशी के इज़हार में हमेशा बेहोश होकर ही लोटेगा ? अच्छा चलो परमिशन दिया.. लेकिन तुम्हारा मद्यप्राशन कौन करायेगा, जरा हम भी तो देखें ? ( इसके जिम्मेदार आप हो समीर भाई, विन्टेज़ की एक बोतलिया बेचारी तुमसे सीलभँग करवाने को अहिल्या बनी एक बरिस से तैयार बईठी है, अपने इंडिया आगे और है
मुला चिट्ठाचर्चा से इसका कउनौ रिलेशन नहिं है
Jan 11th
एक्ठो रहें बड़े ओहदे वाले बड़का ब्लॉगर.. सो डिस्केशन डिस्केशन में उनका डिलेवर भी ब्लॉग-श्लॉग लिख लेने लगा रहा । उनकी काम वाली बाई भी कुछ कविताई की बेहयाई कर लेती रही, सो वहू ब्लॉगर को पकड़ लिहिस । उनका नौकर भी कहीं से कुछ टीप टाप कर एक रेजिस्टर में चेंप देता रहा, छापे में कौन छापता.. सो खुदै कम्पूटर नामक एकु मशीन में लिख कर टाँग देता रहा । ई-सब आदत पकड़ लिहै से उनकी अकड़ की तो आप पूछौ मति ! एहर साहब को डीप-रेस्सन का शौक रहा, जब वह गोली खाय के मूड़ झुकाय के बईठें, तो यहि देख के, ई दुईनो तीनों जन उनके ठियाँ पर जाँय अउर टिपिया आवत रहें । गँज़ी चाँद पर टिपियावै में नौकरी जाय का खतरा, पर ईहाँ टिपियाये पर पगार बढ़वाय का जतरा । दफ़तर जाये से पहिले साहब जी नाश्ते में एक छोटा-कप बीति-ताहि बिलागरस ज़रूर लेत रहें । कुल मिला कर ज़ायज़ा यह कि उनकी एक सुसम्पन्न ब्लॉगर परिवार की छवि बनती रही..
अपने बड़का बिलागर वईसे तो शाकाहारी रहें लेकिन मीट के बड़े शौकीन रहें… जौन रस्ते निकर पड़ें ऊहैं लेयो धड़ाक एकु बिलागर मीट… एहिके सबूत का फोटू उनके मोबैईल में हर घड़ी मौज़ूद रहती आगे और है








