डा. अमर कुमार

बड़े तप और प्रयास से यह परमगति प्राप्त हो पाती है । भागते खसोटते बुद्धिमानों को जब अपनी ही बुद्धि से बिलबिलाते हुआ देखता हूँ, तो अपने जड़त्व पर माथा ऊँचा हो उठता है । ऎसा निट्ठल्लत्व सबको कहाँ नसीब ? कुछ घँटे की बेखौफ़ बेलौस निट्ठल्लई में ’ नावक के तीर ’ चलाने का जो मज़ा है, वह तने हुये टेंटुओं पर टाई लगाने वाले क्या जानें ? यह है सदा ज़वाँदिल बने रहने की गारँटी ! स्वयँ ही खूँटा गाड़ा और अपने पगहे को रोते हो... होवेंगे कोई डा. अमर कुमार... जो इधर डाक्टरी का खूँटाइच उखाड़ कर बिन्दास कुलाँच मारेला ऎ ! पकड़ लो मुझे, समझो बेड़ापार


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